Book Title: Tridanda Author(s): Sukhlal Sanghavi Publisher: Z_Darshan_aur_Chintan_Part_1_2_002661.pdf View full book textPage 1
________________ त्रिदण्ड त्रिदण्ड बुद्ध ने तथा उनके शिष्यों ने कायकर्म, वचन कर्म और मनःकर्म ऐसे त्रिविध कर्मों का बन्धन रूप से प्रतिपादन किया है। इसी तरह उन्होंने प्राणातिपात, मृषावाद आदि दोषों को अनर्थ रूप कहकर उनकी विरति को लाभलायक प्रतिपादित किया है तथा संवर अर्थात् पापनिरोध और निर्जरा अर्थात् कर्मक्षय को भी चारित्र के अंगरूप से स्वीकार किया है। कोई भी चारित्रलक्षी धमोपदेशक उपर्युक्त मन्तव्यों को बिना माने अपना आध्यात्मिक मन्तव्य लोगों को समझा नहीं सकता । इसलिए अन्य श्रमणों की तरह बुद्ध ने भी उपर्युक्त मंतव्यों का स्वीकार व प्रतिपादन किया हो तो यह स्वाभाविक ही है । परन्तु हम देखते हैं कि बौद्ध पिटकों में बुद्ध ने या बौद्ध-भिन्तुनों ने अपने उपर्युक्त मंतव्यों को सीधे तौर से न बतलाकर द्रविड-प्राणायाम किया है । क्योंकि उन्होंने अपना मंतव्य बतलाने के पहले निर्ग्रन्थ परंपरा की परिभाषाओं का और परिभाषाओं के पीछे रहे हुए भावों का प्रतिवाद किया है और उनके स्थान में कहीं तो मात्र नई परिभाषा बतलाई है और कहीं तो निर्ग्रन्थ-परंपरा की अपेक्षा अपने जुदा भाव व्यक्त किया है। उदाहरणार्थनिर्ग्रन्थ-परंपरा त्रिविधकर्म के लिए कायदंड, वचनदंड और मनोदंड १ जैसी परिभाषा का प्रयोग करती थी और आज भी करती है। उस परिभाषा के स्थान में बुद्ध इतना ही कहते हैं कि मैं कायदंड, वचनदंड और मनोदंड के बदले कायकर्म, वचनकर्म और मनःकर्म कहता हूँ। और निर्ग्रन्थों की तरह कायकर्म की नहीं पर मन की प्रधानता मानता हूँ। २ इसी तरह बद्ध कहते हैं कि महाप्राणातिपात और मृषापाद श्रादि दोषों को मैं भी दोष मानता हूँ पर उसके कुफल से बचने का रास्ता जो मैं बतलाता हूँ वह निर्ग्रन्थों के बतलाए रास्ते से बहुत अच्छा है । बुद्ध संवर और निर्जरा को मान्य रखते हए मात्र इतना ही कहते हैं कि मैं भी उन दोनों तत्त्वों को मानता हूँ पर मैं निर्ग्रन्थों की तरह निर्जरा के साधन रूप से तर का स्वीकार न करके उसके साधन रूप से शील, समाधि और प्रज्ञा का विधान करता हूँ। जुदे जुदे बौद्ध-ग्रन्थों में आये हुए उपर्युक्त भाव के कथनों के ऊपर से यह बात सरलता से समझ में आ सकती है कि जब कोई नया सुधारक या विचारक १. स्थानांग-तृतीय स्थान सू० २२० २. मझिमनिकाय सु० ५६ । ३. अंगुत्तर vol. I. p. २२०. Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
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