Book Title: Salaka Purush Part 2
Author(s): Ratanchand Bharilla
Publisher: Todarmal Granthamala Jaipur

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Page 322
________________ (३२२|| .चक्रवर्ती के ७ अंगों (बलों) की संख्या :- स्वामी, अमात्य, देश, दुर्ग, खजाना (कोष), षडंग बल || (सैन्यबल) और मित्र (सुहृत) इस प्रकार सात अंग (बल) होते हैं। | • चक्रवर्ती के षडंग (६ प्रकार का) सैन्य बल :- चक्रबल, ८४ लाख हाथी, ८४ लाख रथ, १८ करोड़ | घोड़े, ८४ करोड़ वीरभट (पैदल सैनिक), असंख्यात देव और विद्याधर सैनिक होते हैं। | चक्रवर्ती के दशांग भोग :- दिव्य नगर, दिव्य भाजन, दिव्य भोजन, दिव्य शय्या, दिव्य आसन, दिव्य नाटक, दिव्य रत्न, दिव्य निधि, दिव्य सेना और दिव्य वाहन । • चक्रवर्ती के नवनिधियाँ :- (१) कालनिधि :- ऋतु के अनुसार नानाविध पदार्थ प्रदान करती है। || ॥ (२) महाकालनिधि :- नानाविध भोज्य पदार्थ प्रदान करती है। (३) माणवक :- विभिन्न प्रकार के आयुध प्रदान करती है। (४) पिंगल :- विभिन्न प्रकार के आभरण प्रदान करती है। (५) नैसर्प :- नानाविध मन्दिर/भवन प्रदान करती है। (६) पद्म निधि :- नानाविध वस्त्र प्रदान करती है। (७) पाँडुक निधि :- नानाविध धान्य प्रदान करती है। (८) शंख निधि :- नानाविध वादित्र प्रदान करती है। | (९) सर्वरत्न निधि :- नानाविध रत्न प्रदान करती है। • चौदह रत्न और उनकी फलदान शक्ति :- १. सेनापतिरत्न :- आर्यखंड और पाँच म्लेच्छखंड पर विजय दिलाता है। २. गृहपतिरत्न :- राजभवन की व्यवस्थाओं का संचालनकर्ता एवं हिसाब-किताब रखता है। ३. पुरोहितरत्न :- सबको धर्म-कर्मानुष्ठान का मार्गदर्शन देता है। ४. स्थपति रत्न :- चक्रवर्ती की इच्छानुसार महल, मंदिर, प्रासाद आदि को तैयार करता है। ५. स्त्रीरत्न :- चक्रवर्ती की ९६ हजार रानियों में मुख्य पट्टरानी। ६. गजपतिरत्न :- शत्रु राजाओं के गज समूह को विघटित करता है। ७. अश्वरत्न :- तिमिस्रगुफा के कपाटोद्घाटन में बारह योजन तक दौड़कर पार होता है। ८. चक्ररत्न :सेना के ऊपर आनेवाली धूप, वर्षा, धूलि, ओले, वज्र आदि को दूर करता है। ९. असि रत्न :- चक्रवर्ती के चित्त को प्रसन्न करता है। ११. दण्डरत्न :- चक्रवर्तियों के सैन्य की जमीन को साफ करता है। | १२. काकिणीरत्न :- गुफा आदि में रहने वाले अंधकार को दूर कर प्रकाश करता है । १३. चूड़ामणि रत्नः- ॥ २४

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