Book Title: Ratnastok Mnjusha
Author(s): Dharmchand Jain
Publisher: Samyaggyan Pracharak Mandal

View full book text
Previous | Next

Page 92
________________ गोत्रकर्म की दो प्रकृति - 1. उच्च गोत्र और 2. नीच गोत्र । अंतराय कर्म की पाँच प्रकृति - 1. दानान्तराय 2. लाभान्तराय 3. भोगान्तराय 4. उपभोगान्तराय और 5. वीर्यान्तराय । (32) बत्तीसवें बोले - बत्तीस प्रकार का योग संग्रह - 1. लगे हुए पापों का प्रायश्चित्त लेने का संग्रह करे । 2. दूसरे के लिये हुए प्रायश्चित्त को किसी ओर को नहीं कहने का संग्रह करे । विपत्ति आने पर भी धर्म में दृढ रहने का संग्रह करे । 4. निरपेक्ष तप करने का संग्रह करे । 5. सूत्रार्थ ग्रहण करने का संग्रह करे । 6. 3. शुश्रूषा (शरीर की शोभा) टालने का संग्रह करे । अज्ञात कुल की गोचरी करने का संग्रह करे । निर्लोभी होने का संग्रह करे । 9. बावीस परीषह सहने का संग्रह करे । 10. साफ दिल (सरलता) रखने का संग्रह करे । 11. सत्य-संयम रखने का संग्रह करे । 7. 8. 87

Loading...

Page Navigation
1 ... 90 91 92 93 94 95 96 97 98