Book Title: Mokshmala
Author(s): Paramshrut Prabhavak Mandal
Publisher: Paramshrut Prabhavak Mandal
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१७४ श्रीमद् राजवंद्र भणीत मोक्षमाला. छ ? एर्नु कारण मात्र एटलुंज के ते एशब्दनी वहोळताने समज्यु छे, किंवा एनुं लक्ष एवी अमुक वहोळताए पहोंघ्यु छ जेथी जगत् एम कहेतां एवंडो मोटो मर्म समजी शकेछ तेमज ऋजु अने सरळ सत्पात्र शिष्यो निम्रय गुरुथी ए त्रण शब्दोनी गम्यता लइ द्वादशांगी ज्ञान पामता इता. आवी रीते ते लब्धि अल्पज्ञता छतां विवेक जोता क्लेशरुप नयी.
शिक्षापाठ ९२. तत्त्वावबोध भाग ११.
एमज नवतत्व संबंधी छे. जे मध्य वयना क्षत्रियपुत्र जगत् अनादि छे, एम वेधडक कही कोंने उडाड्यो हशे, ते ते पुरुषे | कइ सर्वज्ञताना गुप्त भेद विना कयु हशे ? तेम एनी निर्दोषता विषे ज्यारे आप वांचशो त्यारे निश्चय एवो विचार करशो के ए परमेश्वर हता. कर्चा नहोता अने जगत् अनादि हां तो तेम कह्यु. एना अपक्षपाती अने केवळ तत्त्वमय विचारो आप अवश्य विशोषवा योग्य छे. जैन दर्शनना अवर्णवादीओ जैनने नथी जाणता एटले एने अन्याय आपे छे, ते ममत्वथी अधोगति सेवशे.
आ पछी केटलीक वातचित थइ. प्रसंगोपात ए तरव विचारवान वचन लइने सहर्ष हुं त्याथी उठ्यो हतो.

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