Book Title: Kriya Kalap
Author(s): Pannalal Shastri
Publisher: Pannalal Shastri

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Page 10
________________ Shri Mahavir Jain Aradhana Kendra www.kobatirth.org Acharya Shri Kailassagarsuri Gyanmandir ( ६ ) एवं देवतास्तवनक्रियायां चैत्यभक्ति पंचगुरुभात व कुर्यात् । -चरित्रसार । चैत्यपंच गुरुस्तुत्या नित्या सन्ध्या सुवन्दना । + + + जिरणदेववन्दणाए चेदियभक्ती व पंचगुरुमत्ती । + + + ऊनाध्यक्य विशुद्धयर्थं सर्वत्र प्रियभक्तिका । -अनगारधर्मामृतोक्त उद्धरण त्रिसन्ध्यं वन्दने युंज्याचैत्यपंचगुरुस्तुती । प्रियभक्ति बृहद्भक्तिष्वन्ते दोषविशुद्धये ॥ तद्यथा श्रुतदृष्ट्रात्मनि स्तुत्यं पश्यन् गत्वा जिनालयम् । कृतद्रव्यादिशुद्धिस्तं प्रविश्य निसही गिरा ॥ चैत्यालोकोद्यदानन्दगलद्वाष्पस्त्रिरानतः । परीत्य दर्शनस्तोत्रं वन्दनामुद्रया पठन् ॥ कृत्वेर्यापथसंशुद्धिमालोच्या नम्रकाङ्घिदोः । नत्वाभित्य गुरोः कृत्यं पर्यङ्कस्थोऽग्रमंगलम् ॥ उक्तात्तसाम्यो विज्ञाप्य क्रियामुत्थाय विग्रहम् । प्रह्वीकृत्य त्रिभ्रमैकशिरोऽवन तिपूर्वकम् । मुक्ताशुक्त्यङ्कितकरः पठित्वा साम्यदण्डकम् ॥ कृत्वावर्तत्रयशिरोनतीभूयस्तनुं त्यजेत् ॥ प्रोच्य प्राग्वत्ततः साम्यस्वामिनां स्तोत्रदंडकम् । वन्दनामुद्रया स्तुत्वा चैत्यानि त्रिप्रदक्षिणं ॥ आलोच्य पूर्ववत्पंच गुरून् नुत्वा स्थितस्तथा । समाधिभत्त्यास्तमलः स्वस्य ध्यायेद्यथाबलम् || -अनगारधर्मामृत | For Private And Personal Use Only

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