Book Title: Jivan ka Safar
Author(s): Banechand Malu
Publisher: Z_Ashtdashi_012049.pdf

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Page 2
________________ किशोरावस्था में ड्रग एंव नशे का मजा तो लिया, पर नतीजा देखकर एकदम डर गया। जवानी में भोग विालस में तो रहा लिप्त जरुर, पर खो बैठा जीवन का सही दिशा दर्शन, और गंवा बैठा गरुर। प्रौढ़ावस्था में परिवार तो पूरा बस गया पर, रात दिन गृहक्लेश, ईर्ष्या, द्वेष का नाग गहरा डंस गया। बहुत सुन्दर आगे अब? आगे अब? आगे अब तुम वृद्ध हो गये हो, तुम्हें बुजुर्ग कहेंगे सब हर बात में तुमसे सलाह लेंगे। घर में तुम सब से बड़े होंगे, सब तुमको मान देंगे। हर बात में तुमको आगे रखेंगे। सब तुम्हारे सारे जीवन के, अनुभवों का मीठा फल चखेंगे। क्या ही गर्व की बात होगी, जब सारे समाज में तुम्हारी, चोटी पर ख्यात होगी। मैंने कहा-अरे वाह! जीवन ऐसा सुन्दर है? तब तो आनन्द का समुन्दर है। तब तो जी करता है जिये ही जाएं। जाने की जल्दी क्यों मचायें। वृद्धावस्था भी आ गईअलबत्ता अपने समय से पहले ही आई। हालत यह हुईकानों से कम सुने और आंखों से मुश्किल से दे दिखाई। दांतों ने कब की अपनी राह ली, कमर झुक गई, सहारे के लिए हाथों में लाठी आई। मुझ से सलाह मांगनी तो दूर, कभी किसी की गलती पर टोक दूं तो सुनना पड़ेऐसे ही बकता है, बुद्धि जो सठियाई। बोला-हां-हां / तभी तो कहता हूं इतनी जल्दी क्या है? जो आनन्द यहां है वो और कहां है? मैं भरमा गयामन की बातों में आ गया। बड़े तरीके से दिखाये गये। सब्ज बागों में लुभा गया। सारी झिझक निकाल कर, हो गया खड़ा कस कर कमर। चल पड़ा तय करने, जीवन के लम्बे सफर की डगर। यह रास्ता ही ऐसा है, एक बार चल पड़ा तो भटक गया, भरमा गया इससे मुझे उसने आगाह भी नहीं किया। भटकने से बचने का कोई गुरुमंत्र भी नहीं दिया। बुजुर्गीयत की इज्जत तो दूर, मेरी घर में हाजिरी भी किसी को नही सुहाई। भगवान का नाम कभी सीखा तो नहीं था, पर ऐसी दुर्दशा में पता नहीं कहाँ से आ गया, बोला-भगवान! हाथ जोड़कर तुम्हारी देता हूं दुहाई। अब जल्दी बुलाओ। जन्म स्थान से श्मशान तक का, छोटा सा सफर, अब और लम्बा मत बनाओ। अब और लम्बा मत बनाओ। कोलकाता हुआ यहबचपन में ही आसपास के वातावरणों को देख मन एकदम कुण्ठा से भर गया। 0 अष्टदशी / 1700 Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org

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