Book Title: Jinendra Prasad Varniji Life
Author(s): 
Publisher: ZZZ Unknown

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Page 6
________________ ( 5 ) इष्ट है कि इसका उदभ्व एक चमत्कारिक घटना है, अन्यथा कोई भी एक व्यक्ति अकेला ऐसा महान कार्य कर सके यह सम्भव प्रतीत नहीं होता । आपने स्वयं भी कभी कोश बनाने का संकल्प किया हो, ऐसा नहीं है । स्वाध्याय करते हुए सहज रूपसे नोट किया करते थे । धीरे-धीरे उनका संग्रह इतना बढ़ गया कि वह जंगल प्रतीत होने लगा । इस संग्रह को अधिक विशद तथा उपयोगी बनाने के लिये दोबारा पुनः सकल वाङ्गमयका अध्ययन किया और इसी प्रकार तृतीय बार पुनः किया। जो-जो पढ़ते गए उसे अनुभव की कसौटी पर कस कसकर समझते भी गए । फलतः ज्ञान विशद होता गया और नोटों का संग्रह अत्यन्त विशाल हो गया । लगभग एक मन कागज एकत्रित हो गए । उपयोगी बनाने के लिये 'इन्हें ठीकसे संजो दिया जाय, ऐसी बुद्धि उत्पन्न हुई और केवल ५-६ वर्ष में कोश का प्रारूप तैयार हो गया, जिसे प्रकाशनार्थं पुनः ठीकसे लिखने में दो वर्ष और लगे । ट्रा आपका हृदय अर्न्तशान्ति व प्र ेम से श्रोतप्रोत साम्यता तथा माधुर्य का आवास है, बौद्धिक जगतकी अपेक्षा हार्दिक जगतको अधिक सत्य समझते हैं और मुखसे कहने तथा कानों से सुनने की अपेक्षा अपने जीवन में उतारना तथा दुसरों की आंखों में पढ़ना आपको अधिक महत्वपूर्ण लगता है । अपनी तथा दूसरोंकी बातों को वैज्ञानिक कसौटी पर कसना आपका स्वभाव है, इसलिये किसी भी प्रकारकी साम्प्रदायिक रूढ़ि आपको स्पर्श नहीं कर सकी । निजकी स्वतन्त्र अनुभूतियों पर प्राधारित होने के कारण आपकी साधना समाज में प्रसिद्ध अन्य साधकों की पेक्षा कुछ विलक्षण है । बाह्याचार को श्राप साधना का प्रत्यावश्यक अंग समझते हैं, और इसलिये बड़े से बड़े त्याग व तप करते हैं, परन्तु इन सब में आपकी दृष्टि अन्तर्मल शोधन अर्थात् इन्द्रिय-वासनाओं के तथा कषायों के निग्रह पर रहती है, लोक - दिखावे पर नहीं । इसलिये जो कुछ करते हैं गुप्त रीति से करते हैं और वह सब सुयुक्ति युक्त होता है अन्धा नहीं । यदि कोई बाह्य क्रिया आपको अपने भीतर में विकल्पों की और बाहर में विविध कृत्रिमताओं

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