Book Title: Jain Vidya 20 21
Author(s): Kamalchand Sogani & Others
Publisher: Jain Vidya Samsthan

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Page 100
________________ जैनविद्या - 20-21 89 सत्य ___ सत्जनों से साधुवचन बोलना सत्य है। सभी गुण-सम्पदायें सत्य वक्ता में प्रतिष्ठित होती हैं । झूठे का बंधुजन भी तिरस्कार करते हैं। उसके कोई मित्र नहीं रहते। जिह्वा-छेदन, सर्वस्वहरण आदि दण्ड उसे भुगतने पड़ते हैं। 2 सत्यवादिता, पीतलेश्या का लक्षण है। सत्य, हित, मित बोलना शुभ वाग्योग है। जो वचन पीड़ाकारी हैं वे भी अनृत हैं। मिथ्याभाषी का कोई विश्वास नहीं करता। वह यहीं जिह्वाभेद आदि दण्ड भुगतता है। जिनके सम्बन्ध में झूठ बोलता है, वे भी उसके वैरी हो जाते हैं इसलिए उनसे भी अनेक आपत्तियाँ आती हैं, अतः असत्य बोलने से विरक्त होना कल्याणकारी है।66 शौच आत्यन्तिक लोभ की निवृत्ति को शौच कहते हैं। शुचि का भाव या कर्म शौच है। जो पूर्ण मनोनिग्रह में असमर्थ हैं उन्हें परवस्तुओं सम्बन्धी अनिष्ट विचारों की शान्ति के लिए शौच धर्म का उपदेश है। यह लोभ की निवृत्ति के लिए है। शुचि आचार वाले निर्लोभ व्यक्ति का इस लोक में सम्मान होता है। विश्वास आदि गुण उसमें रहते हैं। लोभी के हृदय में गुण नहीं रहते। वह इस लोक और परलोक में अनेक आपत्तियों और दुर्गति को प्राप्त होता है। दान अनुग्रह के लिए धन का त्याग दान है - "अनुग्रहार्थं स्वस्यातिसर्गो दानम् 69 भट्ट अकलंकदेव के अनुसार - "स्वस्यपरानुग्रह-बुद्ध्या अतिसर्जनं दानम्' अर्थात् अपनी वस्तु का पर के अनुग्रह के लिए त्याग करना दान है। पर की प्रीति के लिए अपनी वस्तु को देना त्याग है । आहार देने से पात्र को उस दिन प्रीति होती है। अभयदान से उस भव का दु:ख छूटता है अतः पात्र को सन्तोष होता है। ज्ञानदान तो अनेक सहस्र भवों के दुःख से छुटकारा दिलाने वाला है; ये तीनों विधिपूर्वक दिये गये त्याग कहलाते हैं। किसी से विसंवाद न करना दाता की विशेषता है। दानशीलता मनुष्यायु का आस्रव है। सन्तोष जैसे पानी से समुद्र का बड़वानल शान्त नहीं होता उसी तरह परिग्रह से आशा-समुद्र की तृप्ति नहीं हो सकती। यह आशा का गड्ढा दुष्पूर है इसका भरना कठिन है। प्रतिदिन जो उसमें डाला जाता है वही समाकर फिर मुँह बाने लगता है। शरीर आदि से ममत्वशून्य व्यक्ति परम सन्तोष को प्राप्त होता है। अन्य मानवीय मूल्य श्री भट्ट अकलंकदेव ने 'तत्त्वार्थवार्तिक' में विभिन्न प्रसंगों में अनेक मानवीय मूल्यों का उल्लेख किया है जिन्हें जीवन में स्थान देने से व्यक्ति में गुणात्मक विकास होता है; यथा - दृढ़ मित्रता, दयालुता, स्वकार्यपटुता, सर्वधर्मदर्शित्व, पाण्डित्य, गुरुदेवता पूजनरुचि, निर्वैर, वीतरागता, शत्रु के भी दोषों पर दृष्टि न देना, निन्दा न करना, पापकार्यों से उदासीनता, श्रेयोमार्ग रुचि, चैत्य-गुरु-शास्त्र-पूजा, प्रकृति भद्रता, सुखसमाचार कहने की रुचि, रेत की रेखा के समान

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