Book Title: Jain Hiteshi 1914 Ank 07 08
Author(s): Nathuram Premi
Publisher: Jain Granthratna Karyalay

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Page 20
________________ ४०४ जैनहितैषी annnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnnn था । उसके दोनों तरफ पंखे चल रहे थे और गुलाबजलका छिड़काव हो रहा था। ___ इस सजधजसे मोहम्मदशाह नादिरशाहको लेनेके लिए किलेके दरवाजे तक आया । गरमी का मौसम था, तिस पर भी नादिरशाह भेड़की खालका कोट पहने हुए था ! जब मोहम्मदशाहने नादिरशाहको पोस्तीन पहने हुए देखा तो बड़ा आश्चर्य किया और कहा कि " आप इस मौसममें यह पोस्तीन पहने हुए हैं !" इस पर नादिरशाहने उत्तर दिया कि “ बादशाह सलामत, मुझे यह पोस्तीन ईरानसे हिन्दुस्तान तक ले आया और तुम्हें इस मुलायम तनजेबने दिल्लीके द्वारों तक भी न पहुँचाया ! " तात्पर्य यह है कि कठिनाई झेलनेवाला मनुष्य सब कुछ कर सकता है, परंतु फली फूली चूकनेवालेसे कुछ भी नहीं हो सकता । अत एव यदि किसी मनुष्यकी उच्च पद पर पहुँचनेकी अभिलाषा है तो उसको स्वयं अपने पर निर्भर रहना चाहिए। जिस बातमें उच्च पदकी इच्छा हो, उसमें दूसरों पर कभी निर्भर न रहना चाहिए । स्मरण रहे कि केवल यह समझ लेना कि हम सब कुछ कर सकते हैं और फ़िज़लका झूठा घमंड रखना, इसका नाम आत्मनिर्भरता नहीं है। आत्मनिर्भरता स्वयं प्रत्येक कामके करनेको कहते हैं। आत्मनिर्भर मनुष्य स्तंभके समान होता है। ... आत्मनिर्भरता प्राप्त करनेके लिए यह आवश्यक है कि मनुष्य दसरोंकी सहायता करनेके लिए तैयार रहे; परन्तु स्वयं सहायता न हूँढे । जीवनके आरंभसे ही यह सोच ले कि जीवन एक ऐसा Jain Education International For Personal & Private Use Only www.jainelibrary.org

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