Book Title: Dvadasharnaychakram Part 4
Author(s): Mallavadi Kshamashraman, Labdhisuri
Publisher: Chandulal Jamnadas Shah

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Page 340
________________ द्वादशारनयचके [व्या. महा० १-१-१] [वै०७-१-२६] (टी.) (टी.) (टी.) (टी.) ७१३ ७१६ (मू०) ७३१ (टी.) (मू०) [दिङ्नाग ७३७ [दिङ्नाग ७३७ [आव०नि० २२६४ ] ७३८ [भग. ज्ञ० ११ उ०१० सू-१६-२४ ] (टी.) (मू०) [पा० ३-३-११३] (टी.) (टी.) (मू०) ७४४ ७४५ ७४८ ७४९ टी.) टी.) ७४९ ७५० (टी.) इतरेतराश्रयाणि च० इहेदं. उत्पन्नमाश्रयम् सिद्धे सत्यारंभो नियमार्थः यथा लोको वदति पलालमनिर्दहति विकल्पयोनयः शब्दाः० शब्दान्तरार्थापोहं हि. एकेकोय सयविहो. आता भंते! परमाणुपोग्गले० - उभयनियमारेकृत्यल्युटो बहुलम् समनन्तरानुलोमाः० वैखा मध्यमायाश्च सव्वजीवाणं पियणं. तंपिअदि आवरिज्जेना. कायवाङ्मनःकर्मयोगः स आस्रवः योगवक्रताविसंवादनश्च स्कन्दिर शोषणे रुदिर् अश्रुविमोचने इदि परमैश्वर्ये अनेकार्थाःधातवः आगमतो जाणए अणुवउत्ते. आत्मा बुद्धया समेत्यर्थान्. न हि मूर्तममूर्तत्वम् अहो ण इमे णं. व्येकयोर्द्विवचनैकवचने एहि मन्ये रथेन यास्यसि. प्रकृतिप्रत्ययौ प्रत्ययार्थ. प्रकृतिपर एव प्रत्ययः० कर्तरि कृत् लः कर्मणि च० आधारोऽधिकरणम् प्रहासे च मन्योपपदे० धातुसम्बन्धे प्रत्ययाः व्यत्ययो बहुलम् यथार्थाभिधानश्च शब्दः यस्तु प्रयुके कुशलो. संस्त्याने स्त्यायतेः [वाक्य. १-१४३] [नन्दी. सू. ४१] [नन्दीभा० सू. ४१] [तत्त्वा० ६.१] [तत्त्वा० ६.२] [तत्त्वा० ६-२१] [पा. धा. १४०४] [पा. धा. १०९२] [पा. धा. ६३] ७५० (टी.) (टी.) (टी.) ....-manaw 620...2600mm 6s (टी.) ७५५ ७५४ (मू०) [अनु० ३२ सू०] [पाणिनिशिक्षा का० ६]] ON ७५८ ७५८ ७५९ ७६३ [अनु० सू० १६ ] [पा. १.४.२१-२२] ७६७ टी [व्या. महा० ३-१-६७] [व्या. महा० ३-१-२] [पा० ३-४-६७] [पा० ३-४-६९] [पा० १-४-४५] [वा० १-४-१०६] [पा० ३-४-१] [पा. ३-१-८५] [ तत्त्वा० १-३४ भाष्ये] [ब्या० महा. १-१-१] [व्या. महा. ४-१-३] ७६७ ७६८ ७६८ ७६९ (टी.) (टी.) (टी.) (टी.) ७६९ (मू०) टी.) . ११ For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.org Jain Education International 2010_04

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