Book Title: Dashvaikalika Sutra Author(s): Yashodhara Vadhvani Shah Publisher: Z_Jinavani_003218.pdf View full book textPage 6
________________ 366- जिनवाणी- जैनागम-साहित्य विशेषाङ्क अध्ययन को नाम दिया है दम्मपूप्फियः। परन्तु धर्म का महत्त्व एवं स्वरूप जान लेने भर से उस मार्ग में सुस्थिर हो पाना इतना आसान नहीं है। देह और तन्मूलक आसक्तियाँ (विशेषकर स्त्री शरीर के प्रति) पद-पद पर यतमान मनि को विचलित करने में व्यस्त रहती हैं। अत: इन्द्रिय विषयों से दूर, उनके अभाव वाले प्रदेश में रहना पर्याप्त नहीं है: अपितु उनकी उपस्थिति के बावजूद उन्हें नकारने की, क्षणिक मनोदुर्बलताओं पर विजय पाने की दृढ़ता श्रमण मुनि में आनी चाहिए और उसके लिए आवश्यक है मोक्ष की तीव्र इच्छा तथा (जैन) श्रमण-परम्परा में अटूट श्रद्धा। यही विषय है 'श्रामण्यपूर्वकम्' (के प्राकृत) नाम वाले दूसरे अध्ययन का, जिसमें उत्तराध्ययन के कुछेक अंशों के साथ भाषा एवं शैली की समानता ध्यान खींचती है। जो गृहस्थों / श्रावकों के लिए तो सर्वसामान्य हों, पर मुनियों के लिए वयं । क्षुद्र माने जाएं, ऐसे कुआचरणों एवं पदार्थों की गिनती तीसरे अध्ययन में मिलती है। मुनि के आवार-गोचर का सार है महाव्रतों का पालन और उनका आधार है जीवदया। इस हेतु जगत् में विद्यमान जीवदेहों के छह प्रकार जानने चाहिए. इन्हीं को निरूपित किया गया है षड्जीवनिका नामक चौथे अध्ययन में। साथ ही इन जीवनिकायों की सुरक्षा के लिए यानी अहिंसा के लिए मुनि को अपने चलने-फिरने या उठने-बैठने में जो संयम बरतना चाहिए, यह सब भी यहां वर्णित है, अत: इसे धर्मग्रज्ञप्ति भी कहते हैं। हालांकि अधिकतर जीवनिकायों को उनकी इधर-उधर की गति या वृद्धि के आधार पर जाना जा सकता है, फिर भी कुछ जीवों के शरीर इतने सूक्ष्म होते हैं कि निरी आंखों से दिखने तक नहीं। ऐसे जीवों को भी स्वयं के हाथों त्रास या हानि न हो, इस उद्देश्य से जैन परंपरा में रात्रिभोजन-विरमण नाम का छठा संयम भी महाव्रतों में जोड़ा गया है। लेकिन भोजन के संदर्भ में केवल 'कब खाना या न खाना' यह विचार पर्याप्त नहीं हैं, 'क्या और कैसे खाना या न खाना' यह भी उतना ही महत्त्वपूर्ण है। वैसे तो, संसार की हर वस्तु में किसी न किसी स्थूल या सूक्ष्म जीव की उपस्थिति संभव है, लेकिन धर्माचरण के साधनभूत शरीर को टिकाने हेतु खान -पान तो अनिवार्य है, अत: यह शरीरधर्म निभाते हुए, न्यूनातिन्यून हिंसा या पर पीड़ा हो, यही देखना मुनि के हाथ में है और इस वास्ते, भिक्षाचर्या के लिए उपयुक्त समय, स्थल, मांगने की विधि आदि के बारे में अनेक उत्सर्ग--अपवाद आदि बताए गए हैं पिण्डैषणा शीर्षक वाले पांचवें अध्ययन में। गति और भोजन के संदर्भ में महत्तम अहिंसा के विचार के पश्चात् Jain Education International For Private & Personal Use Only www.jainelibrary.orgPage Navigation
1 ... 4 5 6 7 8