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________________ सद्भावधी संपतीली वा कम्प नाई जालिकेवळ २५६श्रेणी बहनो प्रथम मुल ते ६ वी जलते यात्री जावमिलते ॥ सा सिल से टिणं विश्वमसु समसंखेद्य सेट पर संविभागे ॥ मक्रिय कसरी रतिम नलवा असं व्परता नता वीजप साध्ये गुति एते वारे व्याई एवं हा सलावधी असं पाती प्रायवा त्रिजानामिल कि रुपतेत्री जा वर्ग मुल वेरु लीव कल्पानुए माम्मे णी रूप विस्ताचीग्रह प्रथवा रुव नुज घनप्राह रूप काहवणं भुलतथव अगुलविय ॥ वयमूलतत्व मुलं वपन्न जना प्रकार तर कर एलीश्रेणीसवि लिजेएनले प्रथज ॐ नवनवत्या भुश्मुके लकवे क्रियज़िम उसी जालवायाहारी कसरी सचिन विमे दिक नाची थीवी से पात गुला कॅराकनी परिश्रमता र निम नारकीने मुलं ॥ घलयमालमे ताउ सेटी || मक्केलगाड़िया उरा (लियाल एतलक मुकेलकम नयी • नेता आहारसरी राज हानेर श्या । तेयकम्म सरीराजहा। एयसिचे नवे विद्यसरी सुक्ष्म क्षेत्रपल्पोप ] ३ः । से०तेए । विभागनिष्पन्न सेमथ को तहानाणियचा "छः ॥ सेतंसुम खेल पलिउ चुमे । सेर्तविभागनिष्पन्ने सर्तका सं० ते - ना० ज्ञानावादिकभाव | नि०त्रिएप्रकनिपक तेला) ज्ञानादिकगण तमस्तु सप्प झाले २ सेर्कितं नावृष्यमाणे २) निविपन्नत्ते ते० गुणाले नयष्यमा ले निरणयनुकरल तेन य प्रमाण से ० सेन्त्र कोलते प्रमा प्रकारेपप्पी ते ० जीवनाचे गुण तेजी व मुल संष्यातीसंष्पानु करते संख्यात a: सेव्तेए कालत्रमा ल व्या a पा तेषा माल सरके पमाणे माल सेर्कितेमुपमाणे उविहे पं० [ते० || जीवमुलक्ष्यमा हो । । सर्व थी का संध्यात मुल हिलमली एब ने नीवि नसुचीने विषेविसे कहवे इता मिल० ले श्रेलिनाविषं न सुची को गुल नोजे बीजो वलितेत्री जाव मला साधे गुती एत ले इम कह युमाप्रतर क्षेत्र ने विधे
SR No.650011
Book TitleAnuyoga Dwar Sutra
Original Sutra AuthorAryarakshit
AuthorShivchandra Porwal
PublisherRatlam
Publication Year1853
Total Pages200
LanguagePrakrit, Marugurjar
ClassificationManuscript & agam_anuyogdwar
File Size101 MB
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