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________________ उपास ५०० वीत्तवी नई )] उठ) उहीन | | श्रमण सगवंत माहावीरनई | वांदी ] नमस्कार करीनें / इमक हिउँ संपेदितिर उसाहिति२) समां सगर्वमदा वीरं वंदति न सतिश पवंदया ॥ इमनिश्वई हे सगवंत | माहुर | पुलासपुर | नगरबाहिर ] | पांचस ऊं सारानां दारबई ॥ ॥ FU सी एवं खच्खुतं ते ममं पोलासपुरस्म | नगरसब दिया। पंच कुंकारा वलसा | तिहां | उमे | पादिदारी पारिपाटियां || संधारादिक ] ] लेईन । ] विचर जो || तिवारपछी ॥ | तचणं उझे पाडिदारियंपी जा व संघारयंत्र गिल्हित्ताएं दिहरह तते एंस श्रमण सगवंतमहावीरदेव || सद्दालपुत्र || गोसालाना | श्रावकनुं । । पहुवचनसांतली नई || मणे सगवं महावीरे| सद्दाल पुत्र रमजीवि वा सग स्म । एयमहं पडिसुऐति‍ जिहां सद्दाल पुत्र | | गोसालाना श्रावकनां । | पांचसई ऊं सारना हार बीति | प्रभुक एब लीक सद्दान पुत्त्रस्म या जीवीउ वा सगा पंचऊंन कारावासप्सु फा सुएएस बाताह
SR No.650006
Book TitleUpasakadasanga Sutra
Original Sutra AuthorSudharmaswami
AuthorSomji Rishi
PublisherSurat
Publication Year1783
Total Pages202
LanguagePrakrit
ClassificationManuscript & agam_upasakdasha
File Size29 MB
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