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________________ श्रीदशवैकालिक श्रीहारि० वृत्तियुतम् // 425 // प्रथमा रतिवाक्य चूलिका, सूत्रम् 9-14 सीदतः स्थिरीकरणार्थमुत्तिजितस्य परितापना निदर्शनम्। सर्वतो विक्षिप्तः मोहसंतानसंततो दर्शनादिमोहनीयकर्मप्रवाहेण व्याप्तः, क इव- पावसन्नो नागो यथा कर्दमावमग्नो वनगज इव स पश्चात्परितप्यते- हा हा किं मयेदमसमञ्जसमनुष्ठितमिति सूत्रार्थः॥८॥ अज्ज आहंगणी हुँतो, भाविअप्पा बहुस्सुओ। जइऽहं रमंतो परिआए, सामण्णे जिणदेसिए।सूत्रम् // देवलोगसमाणो अ, परिआओ महेसिणं / रयाणं अरयाणंच, महानरयसारिसो।सूत्रम् 10 // अमरोवमं जाणिअसुक्खमुत्तमं, रयाण परिआइ तहाऽरयाणं। निरओवमंजाणिअदुक्खमुत्तमं, रमिज तम्हा परिआइपंडिए॥ सूत्रम् 11 // धम्माउ भट्ठ सिरिओ अवेयं, जन्नग्गिविज्झाअमिवऽप्पते। हीलंति णं दुविहिअंकुसीला, दादुविअं घोरविसं व नागं / सूत्रम् 12 // इहेवऽधम्मो अयसो अकित्ती, दुनामधिजं च पिहुजणंमि / चुअस्स धम्माउ अहम्मसेविणो, संभिन्नवित्तस्स य हिट्ठओ गई। सूत्रम् 13 // भुंजित्तु भोगाई पसज्झचेअसा, तहाविहं कट्ट असंजमं बहुं / गइंच गच्छे अणभिज्झिअंदुहं, बोही असे नो सुलहा पुणो पुणो ॥सूत्रम् 14 // कश्चित् सचेतनतर एवं च परितप्यत इत्याह- अद्य तावदहं अद्य- अस्मिन् दिवसे अहमित्यात्मनिर्देशे गणी स्यां- आचार्यो भवेयं भावितात्मा प्रशस्तयोगभावनाभिः बहुश्रुत उभयलोकहितबह्वागमयुक्तः, यदि किं स्यादित्यत आह- यद्यहं अरमिष्य रतिमकरिष्यं पर्याये प्रव्रज्यारूपे, सोऽनेकभेद इत्याह- श्रामण्ये श्रमणानां संबन्धिनि, सोऽपि शाक्यादिभेदभिन्न इत्याहजिनदेशिते निर्ग्रन्थसंबन्धिनीति सूत्रार्थः // 9 // अवधानोत्प्रेक्षिणः स्थिरीकरणार्थमाह- देवलोकसमानस्तु देवलोकसदृश // 425 //
SR No.600441
Book TitleDashvaikalik Sutram
Original Sutra AuthorN/A
AuthorPunyakiritivijay
PublisherShripalnagar Jain Shwetambar Murtipujak Derasar Trust
Publication Year2012
Total Pages466
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_dashvaikalik
File Size34 MB
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