________________ // 237 // द्यूतत्यजने मत्रिणामुपदेशो नलं प्रति | // 75 // भरतार्दाधिपत्यस्याभिषेकं तत्र भृभुजः / कृत्वा नलस्य हस्त्यादिप्राभृतान्युपनिन्यिरे // 76 // धरित्रीमप्रतिबले नले शासति केवलम् / प्रजासु धृतकोदंडः काम एवोदज़ुभत // 77 // कूबरस्तु बहिः शुद्धो हृदये कुटिलः पुनः। मुखेन मधुरालापी सदा शंख इवाभवत् // 78 // छलान्यालोकयामास राज्ये लुभ्यन्नलस्य सः / मन्ये विनिर्मितः क्रूरैः शाकिनीपरमाणुभिः // 79 // कृतविग्रहरक्षस्य स्फुरद्गुणकदम्बकैः / जैत्रमुद्राभृतो मंत्रप्रबलस्य नलस्य च // 80 // नैव च्छिद्रमभूत्वापि व्यसनच्छलसंभवम् / प्रामवन्न ततो दुष्टः * | कूबरः करसूतवत् / / 8 / / युग्मम् // कित्वस्य शैशवात्सारिद्युतासक्तिरजायत / कलंककणिका सैव यशःपर्वसधाकरे // 82 // जयामि राज्यं सप्तांगमिति करेण चेतसा / सर्वदा देवयामास देवनैः कूबरो नलम् // 83 // जयस्तयोयोश्चंद्राभ्युदयः पक्षयोरिख / विशुद्धाIASI शुद्धयोस्तुल्य एवाभृद् रममाणयोः // 84 // नलोऽन्यदा गमचरबंधमोक्षक्षमोऽपि न / लघु द्युतेऽशकजेतुं मल्लो मल्लमिवाहवे // 85 // रथस्येव नलस्याक्षाः पेतुर्नेष्टा यथा यथा / अमायंत कूबरेणारवत्सारास्तथा तथा // 86 / / ग्रामाद्यैरेरितैीयमानश्रीरपि कौतुकम् / | अत्युज्वलो नलो जज्ञे मेघो वृष्टेजलैरिव / / 87 // अक्षरवश्यैः कामीव क्षयमप्यात्मनो न सः। विवेद धूर्तित इव प्रत्युताप्रीयताधिकम् // 88 // वश्याक्षः कूबरस्वासीन्सुनिवत्पूर्णवांछितः / प्रमोदमेदुरः खान्ते धिक् क्षुद्रान सोदरद्रुहः // 89 // विदग्धकामिनीभ्रूवदिक्षवत्सरिदोघवत् / बालस्त्रीवाम्यवद्धंगे द्युतं धत्तेऽधिकं रसम् // 90 // ततो द्युतखादुरसावेशेन अहिलो नलः। किंचिनाचेतयत्कस्याप्यशृणोन हितं वचः // 91 // व बुझ्या देवमंत्रीयन् शक्रीयन्नाज्ञयाऽपि च / स्वराज्यनाशं नाज्ञासीदऽवज्ञासीच मंत्रिणः // 12 // | तथापि तैर्महामात्रैः सोऽस्माद् द्विप इवोन्मदः / व्यावर्तयितुमारेमे खोपदेशांकुशैरिति // 93 // स्वयं किं ? देव शास्त्राणि विस्मार्याक्षवतीं श्रितः। चौरभ्रष्टमद्यपानानतीत्य त्वं विचेष्टसे // 94 // धर्मः कला कुलं शीलं सत्यं शौच कृतज्ञता / दया क्रिया प्रिया राज्यं // 237 //