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________________ अनगार १८१ अध्याय ६ saas Katha ॐ सदा जयवंते रहो, अथवा ऐसे ही साधुजन सर्वोत्कृष्ट पदको प्राप्त कर सकते हैं । माया कषायका जीतना अत्यंत कठिन कार्य है। फिर भी जिन्होंने आर्जवधर्म के द्वारा उसको जीत लिया है उनको मोक्षमार्गप्रवृत्ति में किसी भी प्रकारका प्रतिबन्ध नहीं आ सकता। ऐसा उपदेश देते हैं जो आर्जवधर्मरूपी नौका के द्वारा दुस्तर भी मायारूपी नदीको लांघ कर पार होगये हैं उनके अभीष्ट स्थानक जाने में भला कौन अन्तराय हो सकता है ? कोई नहीं । भावार्थ - मायाकपायके जीतने वालोंका मो क्षमार्ग निष्कण्टक समझना चाहिये । मायाचारके निमित्तसे जो दुर्गतियोंमें क्लेश अथवा दुःसह गर्दा निन्दा हुआ करती है उसको उदाहरणद्वारा बताते हैं: दुस्तरार्जवनावा यैस्तीर्णा मायातरङ्गिणी । इष्टस्थानगतौ तेषां कः शिखण्डी भविष्यति ॥ २२ ॥ - खलुक्त्वा हृत्कर्णक्रकचमखलानां यदतुलं, किल क्लेशं विष्णोः कुसृतिरसृजत् संसृतिसृतिः । हतोऽश्वत्थामेति स्ववचनविसंवादितगुरु,— स्तपःसूनुर्लानः सपदि श्रृणु सद्धयोन्तरधित ॥ २३ ॥ १५ हे साधुओ ! सुनो, सजनों के हृदय और कानोंको विदीर्ण करनेके लिये करोंतके समान मायावचनका सत्पुरुष कभी भी प्रयोग नहीं करते । संसारमार्ग के बढानेवाली इस अनन्तानुबन्धिनी मायाने विष्णु - वासुदेवको जो असाधारण क्लेश दिया वह किसीसे छिपा नहीं है; क्योंकि वह लोक और शास्त्र सर्वत्र सुनने में आता है । 官 ५८१
SR No.600388
Book TitleAnagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pt Khoobchand Pt
PublisherNatharang Gandhi
Publication Year
Total Pages950
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size29 MB
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