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________________ बनगार म ३११ मलादिकोंके शीघ्र ही छोडदनेको सहसानिक्षेप और शीघ्रता न करके भी यहांपर जीव हैं या नहीं इस बातका पर्यालोचन किये बिना ही उपकरणादिके छोडदेनेको अनाभोगनिक्षेप, एवं बुरी तरहसे पर्यालोचन-प्रमार्जन करके उन वस्तुओंके छोडदेनेको दुःप्रमृष्टनिक्षेप, और प्रमार्जन करके भी उसके बाद फिर यहां जीव हैं या नहीं" यह न देखकर यों ही उपकरणादिके रखदनेको अप्रत्यवेक्षित निक्षेप कहते हैं। ये निक्षेप छहो कायके जीवोंकी बाधाके स्थान हो सकते हैं। एक पदार्थका दूसरे पदार्थके साथ होनेवाले संबंधविशेषको संयोग कहते हैं। इसके दो भेद हैं-उपकरण संयोग और भक्तपान संयोग । उपकरणों के परस्परमें ऐसे संयोगको जो कि हिंसाका साधन हो सके उपकरणसंयोग और भोजनपानकी वस्तुओंके ऐसे संयोगको भक्तपान संयोग कहते हैं; जैसे कि शीत पुस्तकका धूप आदिसे तप्त हुई पीछी आदिके द्वारा झाडना अथवा ढकना : इत्यादि उपकरण संयोग है। तथा सम्मुर्छनादिके सम्भव होनेपर किसी एक पेय वस्तुको दूसरी पेय वस्तुके साथ अथवा भोज नके साथ यद्वा किसी एक भोजनको दूसरे भोजनके साथ अथवा किसी पेय वस्तुके साथ मिलानेको भक्तपानसंयोग कहते हैं। जैसे कि उष्ण जलको शीत जलके साथ अथवा शीत भोजनके साथ मिलाना भक्तपान संयोग है। निसर्ग शब्दका अर्थ स्वभाव होता है। मन वचन और कायकी प्रवृत्ति स्वभावसे ही होती है। किंतु इनकी इस तरहसे दुष्ट प्रवृत्ति करना कि जो वह हिंसाका साधन हो सके उसको निसर्ग कहते हैं। और अत एव मन वचन कायकी अपेक्षा उसके तीन भेद हैं। जैसा कि कहा भी हैसहसानाभोगितदुःप्रमार्जिताप्रेक्षितानि निक्षेपे । देहश्च दुःप्रयुक्तस्तथोपकरणं च निवृत्तिः ॥ संयोजनमुपकरणे पानाशनयोस्तथैव संयोगः । वचनमनस्तनवस्ता दुष्टा भेदा निसर्गस्य ॥ सहसा अनाभोगित दुःप्रमार्जित और अप्रत्यवेक्षित ये चार निक्षेपके, और दुःप्रयुक्त शरीर तथा उपकरण अध्याय
SR No.600388
Book TitleAnagar Dharmamrut
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAshadhar Pt Khoobchand Pt
PublisherNatharang Gandhi
Publication Year
Total Pages950
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size29 MB
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