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________________ संवेग रंगसाला भावश्रेण्यभावे स्वयम्भूदत्तकथायां एकदा दुर्भिक्षप्रारम्भः ॥२९२॥ तहाहिउवरुवरिमगुणठाणं, पडिवजंतस्स होइ भावसिई । दवसिई निस्सेणी, पासायमिवाऽऽरुहंतस्स ॥३७४९।। अह सो सिइमाऽऽरूढो !, वसहि उवहिं च उग्गमाऽईहिं । दोसेहिं उवहयं परि-हरित्तु सम्म खु विहरेज्जा ।।३७५०॥ गणिणा सह संलावो, कज पइ सेसएहिं साहूहिं। मोणं से मिच्छजणे, भज' १सन्नीसु सजणे य ॥३७५१।। इहरा जह तह अन्नोऽन्न-संकहकिखत्तचित्तपसरस्साकस्स वि पमायओ पत्थु-यत्थविग्यो वि होज तओ ॥३७५२॥ आराहणमिच्छतो, तदेगचित्तो जएज सीईए । एयाए विगमम्मि, सयंभुदत्तो व्व सीएज ॥३७५३॥ तहाहि- . कंचणपुरम्मि नगरे, वसंति दो भायरा जणपसिद्धा । अवरोप्परदढपणया, सयं दत्तो सुगुत्तो य ॥३७५४॥ णिययकुलक्कमअविरुद्ध-सुद्धवित्तीए जीवणोवायं । कुणमाणाणं तेसि, कालो वोलेइ लीलाए ॥३७५५॥ अह एगम्मि अवसरे, वुट्ठीविरहेग कूरगहवसओ। पउरजणजणियदुक्ख, दुब्भिकख निवडियं घोरं ॥३७५६।। खीणा चिरसंगहिया, ताहे तणरासिणो महंता वि । सुमहल्ला वि य पल्ला, धन्नाण वि उवगया निहणं ॥३७५७।। सीयंतचउप्पयदुपयवग्ग-मत्रलोइऊण उचिग्गो। परिचत्तववत्यो प-त्थिवो वि आणवइ नियपुरिसे ॥३७५८|| रे! रे! पुरीए जस्सऽत्थि, जेत्तिओ धन्नसंचओ एत्थ । तत्तियमेत्तस्सऽद्ध', तस्स बला गेण्हह लहु ति॥३७५९।। १ सन्नीसु = सम्यग्दृष्टिषु । ॥२९२॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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