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________________ संवेगरंगसाला सामान्यविधिशिक्षास्वरूपम् गृहस्थयोग्यगुणाश्च। ॥१२०॥ गुरुदेवाऽतिथिपूयण-मपक्खवाएण नायदरिसित्तं । असदऽग्गहवजणया, सपणयपुव्वामिभासित्तं ॥१५१३॥ वसणम्मि सुधीरतं, संपत्तीए १अणुत्तुणत्तं च । सगुणपसंसालजण-मऽत्तुक्करिसस्स परिहारो ॥१५१४।। नयविक्कमसालितं, लजालुत्तं सुदीहदरिसित्तं । उत्तमकमवत्तित्तं, पडिवनभरेक्धवलतं ॥१५१५॥ उचियठिइपरिवालण-मदुराराहत्तणं जणपियत्तं । परपीडापरिहारो, थिरया संतोससारत्तं ॥१५१६॥ अणवस्यगुणऽब्भासो, परत्थसंपाडणेक्करसियत्तं । पयइए विणीयत्तं, हिओवएसोवजीवित्तं ॥१५१७।। गुरुजणरायाऽईणं, अवन्नवायाऽऽइकारिपरिहरणं । इहपरलोयाऽपायाऽऽइ-चिन्तणं चेव अइनिउणं ॥१५१८॥ एमाइगुणगणो सावगेहिं, इह परभवे य हियहेऊ । अप्पाणयम्मि निच्चं, निवेसियव्यो पयत्तेण ॥१५१९।। इय गुणजोगाराऽहिय-सामन्नविही गिही अ जत्तेण । साहेइ विसेसविहिं पि, नूण तदऽवंझहेउत्ता ॥१५२०।। सामन्नगुणाऽसत्तो, किमऽलं धरि नरो विसेसगुणे । न हु सरिसवं पि वोढुं, असमत्थो मंदरं धरिही ॥१५२१॥ - लोगडिइपगिट्ठो, एवं चिय भूमिगाऽणुसारेण । सामन्नविहीसिक्ख, सुस्समणो वि हु अणुसरेज ॥२५२२।। अह पुव्वसूइयं चिय, संखेवेगं विसेसविहिसिक्ख । सुस्सावगसाहुगयं, भणामि दुविहं पि सुविभत्तं ॥१५२३।। तत्थ य सामन्नविहि-प्पवित्तिअन्भहियजोग्गयगयस्स। गिहिणो विसेससिक्खा, पढम चिय वुच्चए ताव ॥१५२४॥ सम्ममवगयस्स जिणमय-मऽणुदिणवड्ढन्तसुद्धपरिणामो । परिणाममंगुलं जाणि-ऊण घरवासवासंगं ॥१५२५॥ १ अनुत्तानत्व' = गर्वरहितत्वम् इत्यर्थः ॥१२॥
SR No.600386
Book TitleSamveg Rangshala
Original Sutra AuthorN/A
AuthorJinchandrasurishekhar, Hemendravijay, Babubhai Savchand
PublisherKantilal Manilal Zaveri
Publication Year1969
Total Pages836
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size20 MB
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