________________
धर्मविधि
&॥ ८३६ ॥ चिंतेइ सो वि धुत्तो, संकेओ कसिणपंचमीइ धुवं । पंचंगुलिमसिहत्य-प्पयाणी तीइ मह दिनो ॥ ७३७॥ प्रकरणम् ॥१३॥
दक्खत्तं किंपि अहो, तीसे संकेयवासरो जीए । एवं कहाविओ मह, हरिसं उन्बहसु हेहियय ! ॥ ८३८ ॥ संकेयदिणं कहियं, मातीए ठाणं तु कथवि न मज्झ । ता अज्ज वि मन्निज्जइ, तस्संगममुक्खसंदेहो ॥ ८३९ ॥ तो पुणरवि पवाइय-माह न जाप्रणासि माय ? तब्भावं । अणुरत्तु च्चिय मइ सा, ता अज्ज वि एगया भणसु. ।। ८४० ॥ तीए भणियं पुत्तय ?, सा तुह ना-18 A मंपि न सहइ कुलीणा । सलिलारोवु व थले, ता दुइत्तं दुकरमेयं ॥८४१॥ तुह कज्जे संदेहो, मह पुण निब्भच्छणं असंदिडं।
तह वि हु जाइस्से है, अविलंब नासिगारहिया ॥ ८४२ ॥ इय भणिऊणं पत्ता, तहेव सा सुन्नयारभवणम्मि । अमयरससो. यरेहि, वयणेहि तं बहूमाह ॥ ८४३ ।। रूवेण अप्पतुल्लं, मुद्धे ? विलससु तुभं जुवाणं तं । विगयम्मि जुवणधणे, परितप्पसि किवण इव पच्छा ।। ८४४ ॥ अह दुग्गिला निभच्छण-पुव्वं गलए रित्तु कुविय व्य । तं नीसारइ पच्छिम-दारेण असोगवणियाए ॥ ८४५ ॥ पन्चाइया वि लज्जा- वसओ गोवियमुहा तओ गंतुं । अक्खेइ खेयखिन्ना, एगते कामिणो तस्स ॥ ८४६ ॥ पुव्वं व बच्छ ? तीए, निब्भच्छिया ता धरित्तु गलाम्म । पच्छिमअसोगवर्णिया-दारेणाकड़ ढिया झत्ति ॥८४७॥ तं सोउं सो धुत्तो, चितइ नूर्ण असोगवणियाए । आगच्छिज्जसु तुममिय, संकेओ तीइ मह कहिओ ।। ८४८ ।। तो तं पभ-४ णइ भगवइ ? अवमाणो एस मज्ज पसिऊण । खमियध्वो सा पावा, इत्तो तुमए न वत्तव्वा ॥ ८.९॥ तत्तो सो तरुणनरो, रयणिमुहे कसिणपंचमिदिणम्मि । पच्छिमदारेण गओ, असोगवणियाइ मज्झम्मि ॥ ८५० ॥ दिवो य पहालोयण--पराइ सो
Mu१३३॥ तीइ तेण एसा वि । वीवाहे इव तेसि, अह तारामेलओ जाओ ॥ ८५१ ।। अग्गे वि एगचित्ताइ, ताइ एगीभवंतदेहाई। आ-