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________________ सू अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी विणओ पउँजियव्यो, विणओवितवो, तवोषिधम्मो, तम्हाविणओपउंजियन्वो, गुरुसुसाहु तवरसीसुय, एवं विणएण भावितो भवति अंतरप्पा निच्चं अहिगरण करणकरावण पावकम्म विरत्ते दत्तमण्णुण्णाय उग्गइरुई // 1 // एवं मिणसंवरस्सदारं सम्मंसचरियं होइ सुपणिहियं, इमेहिं पंचहिवि कारणेहिं माणवयणकाय परिरक्खिएहिं णिचं आमरणंतं वएसजोगोनियव्यो धिइमया मतिमया अणासवा अकुलसो अछिद्दो अपरिस्साइ असंकिलिट्ठो सव्वजिणामण्णुण्णाओ // एवं तइयं संवरदारं फासियं पालियं सोहियं नीकलते, पीछा प्रवेश करते, विनय पूर्वक रहे. विनय आभ्यंतर तप है. बाह्य तप से आभ्यंतर तप का महात्म्य विशष है. विनय धर्म का मूल है इस लिये विनय करना, गुरु सुसाधु इत्यादिकों का विनय , करते हुवे. सदैव अधिक रग रहित बनकर तीर्थंकर की आज्ञा के अभिलाषी होवे // 11 // इस प्रकार इस संबर द्वार का सम्यक् रीति से आचरन करे, आचरण कर पालन करे, इस की अच्छी तरह रक्षा करे, जीवन पर्यंत उस का निर्वाह करे, आश्रव रहित, निर्दयता रहित, पाप आने के छिद्र रहित; कर्म की उत्पत्ति रहित परिणामों की मंक्लिष्टता रहित, इस का आराधन करने की आज्ञा श्री तीर्थकर भगवानने *दी है // 12 // इस प्रकार तीसरे संवर दार को स्पर्श कर, पाल कर, शुद्ध अतिचार रहित रख कर, प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवमहायजी ज्वालाप्रसादजी*
SR No.600304
Book TitlePrashna Vyakaran Sutra
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahadur Lala Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Jouhari
Publication Year
Total Pages240
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_prashnavyakaran
File Size25 MB
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