________________ 148 +1 अनुवादक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी पवयणवच्छल्लभावियमणे उट्टे ऊगय पहट्ट तुढे जहरायणियं निमंतइत्ताय साहवे भावओयविदिण्णेय गुरुजणेणंउपविटे, संयमजिऊग मर्स रंकायं तहाकरयलं,अमुच्छिए अगिडे अगढिए अगरहिए अणज्झविवण्णे अगाइले अलुद्धे अणत्तट्टिए असुरसुरं अचवचवं अदुय मबिलविय अपरिसाडियं आलोयभायणे जय मापतेण बवगय संजोग माणगालच विगयधूमं अक्खोवं जण वणाणुलेवणभयं, संजम जाया माया निमित्तं, संजमं भारवहणट्ठयाए भंजिज्जा, पाणधारणट्टयाए संजएणं समियं, एवं आहारसमिइ मार्ग साधने का अभिलाष, कर्म क्षय रूप भावना भावता हुवा, सिद्धांत की वात्सल्यता करता हुवा, मत आहार में मध्यस्थ भाव धारन करता हुवा रत्नधिक [बढे स घुओं को आमंत्रण करके, समान बनवाले की अनुक्रप से आमंत्रणा करके, गुरु महाराज की आज्ञा होने में अपनी काया तथा हाथ को पूंनकर मूर्छा, गृद्धिता लोलुप्ता, निंदा और प्रशंसा रहित निर्मल चित्त से आत्मार्थी बनकर बड 2 शब्द, वच 2 शब्द नहीं करता हुना, शीघ्रता व विलंब गहिन, नीचे नहीं डालता हुवा, प्रकाश पडे वैसे चौडे पात्र में यत्ना पूर्वक संयोजनादि दोष रहित, मनोज्ञ आहार का मयोग नहैं। भीलाला हवा, अच्छे आहार की लव्याख्या नहीं करता हुवा, खराब आहार की निन्दा नहीं करता हवा, गाटा चालने में आंगन की जरूर होती है इस प्रकार शरीररूप गाडा चलाने केलिये, तथा जैसे फोदा फुसी करिये मलमकी जरूर होती है। * सकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदरमहायजी ज्वाला सादजी*