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________________ ज०वि० १४१ वासी जी ॥ यह ॥ धन्य विजय रायजी ढ समकित धारी जी ॥ ढेर || - वर्य पाया सब अतिजी । एकसो देख स्वपन || आपस में चेतावती जी । करीये सुख के जतन ॥ धन्य ॥ १ ॥ प्राते राय शभा विषे जी । निर्मितिक एक आय || स्वपना ने मिलती थी सो । सहू कों बात सुणाय ॥ धन्य ॥ २ ॥ नृपादि सुणी यों महू जी । श्राया हूं तुम हित काम || भयंकर नाग देव को अभी उपसर्ग होसी यह ठाम ॥ धन्य ॥ ३ ॥ तेह निवारण कारणे जी । एकही सीधो उपाव ॥ राजा प्रजा सहू मिल करी । पूजो देवल ये नागराव ॥ धन्य ॥ ॥ ४ ॥ स्वपन ने निमन्तिनी जी । मिली एकही सहू बात । भय पाया सब चित्त में जी । निश्चय सब मन त ॥ धन्य ॥ ५ ॥ सचीव सामान्त प्रजा मिली. जी । उत्तम पूजापो सजाय || पूजा करी नागराय की जी । अति डम्बरे आय ॥ धन्य ।। ६ ।। प्रणमी अर्जी करे सभीजी ॥ कोप निवार जो देव ॥ संतुष्टी सुख सर्व जो । यह स्वीकारी हार सेव ॥ धन्य ॥ ७ ॥ विजय भूप श्रधी
SR No.600301
Book TitleSamyktotsav Jaysenam Vijaysen
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRupchandji Chagniramji Sancheti
Publication Year
Total Pages190
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size15 MB
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