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जी०सु०
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| जावो तेह भणीं । नहीं तो कंरू इन्द्रपे पुकार || व्यर्थ सताया धर्मी भणी । जे रह्या सहू संप धार ॥ संपे ॥ ११ ॥ इम सुणी देवी कहे । तूं पहली छेडी मुज तांय ॥ खाडो खोदे और कूं तो । पडे आपही जाय || संपे ॥ १२ ॥ संप परिक्षा कारणे में । कीधा एता उपाय ॥ चालो आंपां दोनों मिली । धनदत्त ने लावां मनाय ॥ संपे ॥ १३ ॥ दोनों आया सेठ जी कने । कहे चालो आप के घेर ॥ गुन्हो माफ करो माहेरो में इम नहीं करस्यूँ फेर ॥ संपे ॥ १४ ॥ व्यंत्र अग्रह करीने कहे । धन ले जावो आपने साथ ॥ सेट कहे बजन घणो । भूत उठायो निज माथ || संपो ॥ १५ ॥ सहू परिवारे परव । देव देवी करे जय कार | मध्य बजार थी चालीया । सहू पाया अब अपार ॥ संपे ॥ १६ ॥ निज घरे आइ रह्या । तिहां लोक घणा मिल्या आय | पोता की बीतक वारता दीवी सेठ जी सहुने सुणाय ॥ संपे ॥ १७ ॥ ते सुणी सघला जणा । संप कीधो आपस माय ॥ सेठ पुण्यने कीर्ती । विस्तरी मुल्क के मांय ॥ संपे ॥ १८ ॥ ए कदा सतगुरु सा गुण । सेठ दीक्षाली सपरिवार || करणी कर स्वर्गे गया। आगे पामसी सुख अपार ॥ संपे ॥ १९ ॥ सुगुणी कह्यो द्रष्टांत सुण । सासु जेठाणी हर्षाय ॥ तीनीजणी कहे आजी | हमे राखत्वां सम्प सवाय || संपे ॥ २० ॥ सहू रहे आणंद मेंजी ।
खण्ड २
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