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। उँ ॥ श्री परमात्मायनमः ॥ श्रीगुरूभ्योनमः ॥ अथ दया कल्प वल्ली श्री जिनदास सुगुणी पारत्र प्रारंभ ॥दुहा॥ परम ज्योती परमात्मा।चिन्मय स्वयंप्रकाश। निज संपद दे ध्यानी | को। पूरे इच्छित आस॥१॥जिनेन्द्र मुनिन्द्र शिवेन्द्र जे।सुत्रधार अणगार । परमेष्टी पंच पद नमे । वारम्वार नमस्कार ॥२॥ सत्तस्वरूप दर्शक गुरू । अनेकान्त साद्वाद । शुद्ध पंथ, ८ वह मुज दीयो । प्रणमु गृही समाद ॥३॥ भारती वाणी वीरकी । माता दाता ज्ञान । सहाकारक हो सिद्धी करो । नम्र भाव धरूं ध्यान ॥४॥ दया मूल है धर्मका । सर्व समयका
सार । सहु गुरू येही वखाणता । सुयगडांग अधीकार ॥ ५७॥ गाथा ॥ एवं खुणाणी गो सारं, जं न हिंसाइ किंचणं । अहिंसा समयं चेव । एताव तं विधाणी ॥१७॥ दुहा ॥ पर दुःख देख निज तन दहे । सहे कष्ट दे सुख । क्षमा सील द्रढता धरे । तसर | गुण शुद्ध करे मुख ॥ ६॥ दान सील तपीभावमें । सबसे मोठा तप । अघ हर शिव दे|
आगले । प्रगटें रिद्ध विन खप ॥७॥ दयाल क्षमी तपी गुण गृही ।सुगणी और जिनदास। जन मन गुण ठसाक्वा । करूं चरित्र प्रकाश ॥८॥ पहले निज परको कहूं । गृहो गुण
*अर्थात्-ज्ञान प्राप्त करनेका येही सार है की किंचित मात्र किसीकी भी हिंशा नहीं करना, सर्व धर्मावलन्चियोंका येही
फरमान है.