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उपासकदशांग सानुवाद
२ कामदे वाध्ययन
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निगरप्पगासं रत्तच्छ लोहियलोयणं जमलजुयलचञ्चलजीहं धरणीयलवेणिभूयं उक्कडफुडकुडिलजडिलकक्कसवियडफडाडोवकरणदच्छं लोहागरधम्ममाणधमधमेन्तघोसं अणागलियतिब्वपचण्डरोसं सप्परूवं विउव्वइ, जेवू काळ, नयनविष-दृष्टिविष अने रोषवडे पूर्ण, अंजनना ढगलाना समूहनी पेठे प्रकाश जेनो छे एवं, राती आंख जेनी छे एवं, लाल छे नेत्र जेना एवू, यमल-साथे रहेली अने अत्यन्त चपल जिह्वायुगल जेनुं छे एएँ, पृथ्वीतलनी वेणीरूप, उत्कट, स्पष्ट, कुटिलवक्र जटिल-जटायुक्त, कर्कश-कठोर अने विकट-विस्तीर्ण स्फटाटोप-फेणनो आडंबर करवामां दक्ष-निपुण, धमाती लोहाकर-लोढानी भट्ठीनी पेठे 'धमधम एवा प्रकारनो शब्द जेनो छे एवं, अनाकलित-रोकवाने अशक्य तीव्र-अत्यंत प्रचंड रोष-गुस्सो जेनो छे एवं सापर्नु रूप विकुर्वे छे. विकुर्वीने ज्यां पोषधशाला छे अने ज्यां कामदेव श्रमणोपासक छे त्यां आवे छे. आवीने तेणे कामदेव श्रमणोपाअने 'मूषानी पेठे कालु, 'मयनविषरोषपूर्णम्' नयनविष-दृष्टिविष अने रोष-गुस्सा वडे पूर्ण, 'अञ्जनपुञ्जनिकरप्रकाशम्' अंजनपुंज-काजळना ढगलाना निकर-समूहनी जेवो प्रकाश जेनो छे पq, 'रक्ताक्षम्' राती आंख जेनी एवं, 'लोहितलोचनम्' लाल लोचन हे जेना पद्, 'यमलयुगलचञ्चलजिह्वम्' यमल-साथे रहेली चंचल-अत्यन्त चपल जीभनु युगल जेनुं छे पq, 'धरणितलवेणीभूतम्' कृष्णवर्ण अने लंबाइ बडे पृथिवीतलनी वेणी-केशपाशना जेवू, कोइथी पराभव न थइ शके माटे उत्कट, देदीप्यमान देखातुं होवाथी स्फुट-व्यक्त, वक्र होवाथी कुटिल, केशनी जटाना योगथी जटिल-जटावाळु, नम्रताना अभावथी कर्कश-कठोर, विकट-विस्तीर्ण स्फटाटोप-फेणनो आर्डवर करवामां दक्ष-निपुण, तथा 'लोहागरधम्ममाणधमधमेन्तघोसं' ध्मायमान-धमणना वायु बड़े उद्दीपन कराती अने 'धमधम' एवो शब्द करती लोढानी भट्ठीनी पेठे घोष-अवाज जेनो छे एवं, अहीं विशेष्यनो पूर्वनिपात प्राकृत होवाथी थयो छे. 'अणागलियतिब्वपयंड
१ मूषा-मूस, धातुने ओगाळवानी माटीनी कुलडी,