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________________ क्रमयुगः, त्वमेकं श्रीसद्म क्व च पुनरपुण्यप्रभुरहम् । त्वदालोकस्तन्मे शरदि हिमरश्मी परिणते यथा जात्यन्धस्य प्रवर जगतोऽप्यद्भुतमिदम् ॥२॥" इय थुणिऊणुवविट्ठो नियठाणे पत्थुया य धम्मकहा । पीऊसजलहरासारमहुरवाणीए To जयगुरुणा ॥१६०।। जीवा कसायइंदियविगारवसगा विसोवमं कम्मं । बंधति भूरिभवभमणकारणं बहुविहवियप्पं ॥१६१॥ ॥७९१।। एगिदियाइसु तओ जाईसु अणेगहा भमेऊण । कहकहवि कोवि कइयावि जइ परं लहइ मणुयत्तं ॥१६२॥ लद्धेवि तम्मि निम्मलकुललाभो दुल्लहो जओ जीवा । सारयससंककरपसरगोरजसभाइणो होति ॥१६३॥ तम्मिवि लद्ध रूवा| इयाण गुणकारणाण भावाण । दुल्लहो समागमो भंद ! भव्वजणजणियतोसाण ।।१६४ । तत्थवि अरिहा तग्गणहरो य अन्नोवि बहुसओ साह । कहवि य जई पाविजइ पन्नवओ सुद्धधम्मस्स ।।१६५।। पत्तेवि तम्मि सद्धा नो परिसुद्धा२ पयत्तए तत्तो । ता सव्वगुणुवलंभे जुत्तो धम्मुञ्जमो काउं ॥१६६॥ इहरा कप्पद मसंगमपि जह कोवि निप्फलं नेइ। लिक्खाजूयत्तणपत्थणाए तह भोगसहलतो ।।१६७॥ एसो जणो सहाणेककारणं लछुमेयगुणनिवहं । मूलाओं निप्फलत्तं नेइ दुरप्पा तहाहि इहं ॥१६८॥ कत्थइ पुरे किलेगो आसी कूलपूत्तओ सभावेण । निद्धणचंगो निष्फलवावारो सयलकालंपि ॥१६९।। एत्तोच्चिय सकारं सिरम्मि कइयावि अलभमाणो सो। जाओ लेक्खालक्खेहि तह य जयासहस्सेहिं ॥१७०॥ परिखजमाणमत्थयदेसो पोडं परं परिवहंतो। निम्विन्नो इच्छंतो मरणंपि रई अलभमाणो ॥१७१।। देसंतरसरणाओ पायं णासं उवेइ दालिई । इय चितंतो भुक्खाइ सो किलंता परिभमतो ॥१७२।। पत्तो तत्थ पएसे जत्थेगो कप्पपायवा अत्थि । नियकुसुमसारभुग्गा ॥७९ १॥
SR No.600269
Book TitleUpdeshpad Mahagranth Satik Part 02
Original Sutra AuthorJinendrasuri
Author
PublisherHarshpushpamrut Jain Granthmala
Publication Year1991
Total Pages448
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript
File Size8 MB
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