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________________ १, दहिं २, नवणीयं ३, सप्पि ४, तिल्लं ५, गुडं ६, महुं ७, मज्जं ८, मंसं ९ ॥ १७ ॥ वासावासं पज्जोसवियाणं अत्थेगइआणं एवं वृत्तपुत्रं भवइ, अट्ठो भंते! गिलाणस्स, से य पुच्छ्रियवे - केवइएणं अट्ठो ? से वएज्जा - एवइएणं अट्ठो गिलाणस्स, जं से पमाणं वयइ से य पमाणओ घित्तवे, से य विन्नविज्जा, से य विन्नवेमाणे लभिङजा, से य पमाणपत्ते होउ अलाहि - इय वत्तवं सिआ ? से किमाहु भंते!?, एवइएणं अट्ठो गिलाणस्स, सिया णं एवं वयंतं परो वइज्जा - पडिगाह अजो ! पच्छा तुमं भोक्खसि वा पाहिसि वा, एवं से कप्पइ पडिग़ाहित्तए, नो से कप्पइ गिलाणनीसाए पडिगाहित्तए ॥ १८ ॥ वासावासं पजो० अत्थि णं थेराणं तहप्पगाराई कुलाई कडाई पत्तिआई थिजाई वेसासियाई संमयाई बहुमयाई अणुमयाई भवंति, जत्थ से नो कप्पइ अदक्खु वइत्तए " अस्थि ते आउसो ! इमं वा २ " से किमाहु भंते ! ?, सड्डी गिही गिण्हई वा, तेणियंपि कुञ्जा ॥ १९ ॥ *
SR No.600261
Book TitleKalpsutram
Original Sutra AuthorBhadrabahuswami
Author
PublisherDevchand Lalbhai Pustakoddhar Fund
Publication Year1914
Total Pages142
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_kalpsutra
File Size9 MB
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