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________________ 888 शब्दार्थ जाता है जी० जीव अ० असयंति जा० यावत् दे० देव सि होवे॥४५॥से० ऐसेही भ० भगनन् गो० गौतम । 18 स० श्रमण भ० भगवनू म० महावीर को वं० वंदे ण. नमस्कार कया वं० वंदना करके सं० संयम से त० तपसे अ० आत्मा को भा० भावते हुवे वि. विचरते हैं. ॥१॥१॥* रा० राजगृह ण नगर स० समवसरण प० परिषदाणि निर्गता जा० यावत् ए. ऐमा व० कहा जी सूत्र गोयमे समणं भगवं महावीरं वंदइ णमंसइ, वंदित्ता मंसित्ता संजमेणं तवसाअप्पा णं भावमाणे विहरइ इति पढमसए पढमोदेसो सम्मत्तो ॥ १ ॥१॥ रायगिहे णयरे, समोसरणं, परिसा णिग्गया जाव एवं वयासी. जीवेणं भंते सय वचनों को बहुत मान देकर गौतम स्वामीने श्री श्रमण भगवन्त महावीर को वंदना नमस्कार किया, वंदना नमस्कार कर के संयम व तपसे आत्मा के स्वरूप को विचारते हुवे विचरने लगे यह पहिला शतक का पहिला उद्देशा संपूर्ण हुआ. ॥ १ ॥ १॥ + ___ गत उद्देशे में कर्म के चलनादि प्रश्नोत्तर कहे हैं वे कर्म दुःखरूप होते हैं इसलिये आगे दुःख का प्रश्न oo करते हैं. राजगृह नगर के गुणशील मक उद्यान में भगवन्त श्री महावीर स्वामी पधारे, परिषदा वांदने ।। को आई, वाणी सुनकर परिपदा पाछीगई. उस समय श्री गौतम स्वामीने भगवन्त को प्रश्न पुछा कि अहो भगवन् ! जीव अपना किया हुवा दुःख वेदता है ? अहो गौतम ! कितनेक स्तकृत कर्मवदे, कित पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती)मत्र-800 पहिला शतकका दूसरा उद्देशा विभाथ Anmomroomramnna 8
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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