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शब्दार्थ नालिका अ० अक्ष मु० मूशल इ० इन ध०धनुष्य प्रमाण से दोदो ध०धनुष्य स० हजार गागाउ च० चार
गा० गाउका जो० योजन ए. ऐसा जो० योजन प्रमाण से जे. जो प० पाला जो० योजन का आ०१ लम्बा वि० चौडा जो० योजन उ० ऊर्ध्व उ० ऊंचा तं. उसे तिगुने स० विशेष ५० परिधि से से० उसे ए. एकदिन के बे० दोदिन के ते. तीनदिन के उ० उत्कृष्ट स. सात प. बडे का सं० कर्ण पर्यंत भरा
चत्तारि गाउयाइं जोयणं, एएणं जोयणप्पमाणेणं, जे पलेजोयणे आयाम विक्खंभेणं जोयणं उठें उच्चत्तेणं तं तिउणं सविसेसं परिरएणं, सेणं एगाहिय बेहिय तेहिय उक्कोस सत्तरत्तप्परूढाणं संमटे संनिवेए भरिए बालग्ग कोडीणं, तेणं बालग्गे
नो अग्गी डहेजा, नो वाऊ हरेज्जा, नो कुच्छज्जा, नो परिविद्धंसेज्जा, नो पूइत्ताए भावार्थ है
मूशल होते हैं. इस धनुष्य प्रमाण से दो हजार धनुष्य का एक गाउ, चार गाउ का एक योजन. इस योजन प्रमाण से एक योजन का लम्बा, चौडा, तीगुनी से विशेष परिधिवाला, और एक योजन का उंडा ऐसा एक पाला में देवकुरु उत्तरकुरु क्षेत्र में एक दिन, दो दिन यावत् सात दिन के उत्पन्न हुए युगलिये के बच्चों का बालाग्र के असंख्यात खंड करके भरे. और उस में इतना ठोसकर भ
कि जिस से उन बालानों को अग्नि जला मके नहीं, वायु उडा सके नहीं, सडे नहीं, गले नहीं, विध 15 होवे नहीं, दुर्गंध उत्पन्न होवे नहीं. फीर उस पाले में सो सो वर्ष में एक २ बाल्यय नीकाले इस तरह सो
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी।
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदवसहायजी ज्यालाप्रसादजी *