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श्री अमोलक ऋषिजी
भावार्थ
#० रू पर्वत के दा० दक्षिणार्ध में दि० दिन भ० होता है त० तब उ० उत्तरार्ध में दि० दिन भ.. होता है. ज. जब उ० उत्तराध में दि• दिन भ० होता है त० तब जं• जम्बूद्वीप के मं० मेरु पर्वत की
उत्तरड्डेवि दिवसे भवइ जयाणं उत्तरड्डेवि दिवसे भवइ तयाणं जंबुद्दीवेदीवे मंदरस्स । पव्वयस्स पुरच्छिमपच्चच्छिमेणं राई भवइ ? हंता गोयमा ! जयाणं जंबुद्दीवे दीवे
दाहिणड्डे दिवसे भवइ जाव राई भवइ ॥ जयाणं भंत ! जंमंदरस्स पबयरस
पुरच्छिमेणं दिवसे भवइ, तयाणं पच्चच्छिमेणवि दिवसे भवइ, जयाणं पञ्चच्छिमेणं दिवसे दिन होता है तब मेरु से उत्तर में भी दिन होता है ; और जब उत्तर दिशा में दिन होता है तब या मेरु पर्वत की पूर्व पश्चिम में रात्रि होती है ? हां गौतम ! मेरु पर्वत की उत्तर दिशा में जब दिन होता है तब पूर्व पश्चिम दिशा में रात्रि होती है. जम्बूद्वीप में दो चंद्र दो मूर्य फीरते हैं. अब जम्बूद्वीप के उत्तर, दक्षिण, पूर्व व पश्चिम ऐमे चार विभाग करना. जब उत्तर दक्षिण में दोनों सूर्य रहने से दिन होता है तब पूर्व पश्चिम में दोनों सूर्य के अभावसे रात्रि होती है. मेरु पर्वत की पास ९४००१ योजन व एक योजन के दश भाग में का नव भाग इतने क्षेत्र में दिन रहता है और, लवण समुद्र की वाम ९४८६८ और एक योजन के दश भाग में का चार भाग दिन रहता है. मेरु पर्वत की पास ६३२४ योजन और दश के छ भाग रात्रिक्षेत्र होता है और लवण समुद्र की पास ६३२४५ योजन
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादगी *
अनुवादक-बालब्रह्मचा