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शब्दार्थ
अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमालक ऋषिजी
लि. लिपिक को| ॥रा० राजगृह में च० चलन दु• दुःख क० कांक्षा प्रदोष प० प्रकृति पु. पृथ्वी जा.. जावन्त ० नारकी बाबाल गु गुरुक च० चलन।।*॥ण नमस्कार सु श्रुतको ते. उस का०काल ते०1 उस स० समय में रा० राजगृह णा० नाम न० नगर हो० था व वर्णन वाला त० उस रा० राजगृह
ओसेय, पगइ, पुढवीओ, जावंते, नेरइए, बाले, गुरुएय, चलणाओ॥ ॥णमो सुअस्स॥ तेणं कालेणं तेणं समएणं रायगिहे णामं णयरे होत्था, वण्णओ तस्सणं रायगिहचलिए इत्यादि चलण विषय अर्थ का निर्णय रूप पहिला उद्देशा नव प्रश्न का जानना. २ दुःख-इस में जीव अपना कीया हुवा कर्म वेदता है इत्यादि प्रश्नकी पृच्छा है. ३ कांक्षा प्रदोष-इस में जीवने , कांक्षा मोहनीय कर्म किया? ऐसे प्रश्नोंकी पृच्छा है ४ प्रकृति-इस में कर्म की कितनी प्रकृतियों कही। इत्यादि प्रश्नकी पृच्छा है. पृथ्वी-इस में रत्नप्रभादि कीतनी पृथ्वी है इसका निर्णय किया है ६ जावंत इसमें जितना अंतर से सूर्य का उदय होता होवे उसका निर्णय किया है ७ नारकी-इस में नरक में नारकी उत्पन्न होते हैं या नारकी सिवाय अन्य जीव उत्पन्न होते है इसका निर्णय किया है ८ बाल-इसमें एकान्त वालका स्वरूप कहा है, ९ गुरुक-इसमें कोनसा जीव भारी होता है इसप्रश्न का निर्णय किया है १०१ चलणाओ-इसमें अन्य दर्शनियों का ऐसा कथन होवे कि चलमाणे अचलिए इत्यादि प्रश्न का निर्णय किया है। इस द्वादशांग रूप श्रुत सो अहंतू प्रवचन उसको नमस्कार होवो. इस तरह नमस्कार करके श्री
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुवासहायनी मालामसदनी