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पंचमाङ्ग विवाह पण्णचि ( भगवति ) सूत्र
भण्णंति, सव्वेसि जागि सेस्माणि ठाणाणि सव्वत्थ पढम वितिया भंगा ॥ एगिदिया सव्वत्थ पढम वितिया जहा पावे ॥ एवं णाणारणिजेणवि दंडओ;एवं आउयवजेसु जाव अंतराइए दंडओ॥ अंणतरोववण्णएणं भंते! णेरइए आउयं कम्मं किं बंधी पुच्छा?गोयमा! बंधी णबंधइ बंधिस्सइ । सलेस्सेणं भंते ! अणुतरो वण्णए णेरइए आउयं कम्म किं बंधी एवं चेव ततिओ भंगो ॥ एवं जाव अणागारोवउत्ते सव्वत्थवि ततिओ भंगो ॥ एवं मणुस्सेवजं जाव वेमाणिया ॥ मणुस्साणं सव्वत्थ ततिओ चउत्थो भंगो
णवरं कण्हपक्खिएमु ततिओभंगो सव्वेसिं णाणत्ताइं चेव ॥ सेवं भंते! भत्ते त्ति ॥ वचन योगी व अयोगी में अग्यारह कहना नहीं. वाणव्यंतर, ज्योतिषी व वैमानिक का नारकी जैसे कहना । जो शेष स्थान रहे हुवे हैं उनसर्व स्थानों में पहिला व दूसरा भांगा कहना. एकन्द्रिय में पापकर्म जैसे पहिला दूसरा भांगा कहना. ऐसेही ज्ञानावरणाय और आयुष्य वर्जकर अंतराय पर्यंत सक्कर्म का जानना. अनुत्तरोप । पातिक नारकीने क्या आयुष्य कर्म का बंध कीया ? अहो गौतम ! ऐसेही तीसरा मांगा कहना. ऐसेही अनाकारोपयुक्त सर्वत्र तीसरा भांगा कहना. ऐनेही मनुष्य वर्जकर यावत् वैमानिक पर्यंत कहना. मनुष्य सब स्वान वीसरा चौथा भांगा पाताहै, परंतु कृष्ण पक्षी मनुष्यमें तीसरा मांगाही कहना. अहो भगवन्! ।। ।
428+ छब्बीसवा शतक का चारा उदेशे
भावार्थ