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4 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
पंचिदिय तिरिक्खजोणिएणं भंते! जे भविए णागकुमारेस उववजित्तए सेणं भंते! केवई कालट्टिती ? गोयमा ! जहण्णेणं दसवाससहस्सट्रितीएस उक्कोसेणं देसूण दुपलिओ वमठितीएसु उववज्जेज्जा ॥ तेणं भंते! जीवा अवसेसो सोचेव असुर कुमारेसु उववज्ज २५९० माणस्स गमको भाणियव्यो जाव भवादेसोत्ति ॥ कालादेसेणं जहण्णेणं सातिरेगा पुव्वकोडी दसहिं वाससहस्सेहिं अब्भहिया, उक्कोसेणं देसूणाई पंचपलिओवमाइं एवइयं जाव करेजा ॥ १ ॥ सोचे। जहण्णकालद्वितीएस उववण्णो एसचेव वत्तव्वया णवरं णागकुमारठिति संवेहं च जाणेज्जा ॥ २ ॥ सोचव उक्कोसकाल. ठितीएस उववण्णा तस्सवि एसचव वत्तव्बया णवरं ट्रिती जहणणं देसणाई दो। असंख्यात वर्ष के आयुष्य वाले उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! संख्यात वर्ष के आयुष्य वाले उत्पन्न होते , हैं और असंख्यात वर्ष के आयुष्य वाले भी उत्पन्न होते हैं. असंख्यात वर्ष के आयुष्य वाले संझी पंचेन्द्रिय नागकुपार में उत्पन्न होने योग्य होथे वे वहां कितनी स्थिति से उत्पन्न होवे ?अहो गौतम! जघन्य दश हजार वर्ष उत्कृष्ट देश उना दो पल्योपम में यावत् उत्पन्न होवे शेष सब असरकुमार जैसे भवा देशतक गमा कहना. कालादेशसे जघन्य साधिक पूर्वक्रोड और दशहजारवर्म अधिक उत्कृष्ट देश ऊना पांच पल्योपम वही
• प्रकाशक राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
मावार्थ