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प्रयोजक बाल ब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी -
आठवे शतक का-सातवा उद्देशा. १११२ १३१९ स्थविर अन्य तीर्थक की चर्चा...१११२
३३१ सरीर बंध के दो प्रकार. ...११६६
३३२ सरीर प्रयोग बंध के पांच प्रकार ११६८ १३२० पांच प्रकार का गतिमवाद ...११२३
३३२ पांचों शरीर प्रयोग बंध किस २ आठवा शतक का-आठवा उद्देशा ११२॥
कर्मोदया से होवे देश बंध सर्व बंध गुरु के-गति के-समह के-सूत्र के भाव
की स्थिति अल्पाबहुत्वे अन्तर. १९७० के प्रत्याख्यानीक ... ...११२८
३३३ अठो कर्म बंध के कारण. .... ३२२ पांच प्रकार के व्यवहार. ...१९२८ ३३४ पांचों शरीर का परस्पर बन्ध. १२३७ ३२३ इर्या पथिक सम्परायिक बंध के भांगे११३२ आठवे शतक का-दशवा उदेशा. २४ वाईस परिषह किस कर्मोदयसे ...११४३
३३५ ज्ञान क्रिया से आराधक की चौमंगी १२१२ ३२५ सूर्य दृष्टीगत आने के तपने के प्रश्नोसर ११४९ ३२६ आढाइ द्वीपके बाहिर भीतर के
३३६ तीन प्रकार की आराधनाका कथन. १२१६ ज्योतिषी का अधिकार , ...११५३ ३३७ पुद्गल परिणाम के पांच प्रकार.
आठवे शतक का-नववा उद्देशा. ३३८ पुद्गलों के सम्बन्ध के प्रश्नोत्तर.. ३२७ प्रयोगवध विसेसबंध का कथन ११५५
३३९ अठों कर्म के अविभाग परिछेद १ ३२८ अनादि सादी वीसेसा बंध. ...११५६ ।
३४० अठों कर्मों का परस्पर सम्बन्ध. ... १२२८ ३२९ प्रयोग बन्धके तीन प्रकार. ...११६० । ३४१ जीव पुद्गल कि पदली? ...१२
*प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*
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