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भावार्थ |
40- पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 403
॥ द्वाविंशतितम शतकम् ॥
ताले यि बहुबीया गुच्छाय गुम्मवल्लीय ॥ छद्दसवग्गा एए सट्ठी पुण होत उसा || १ || रायगिहे जाव एवं वयासी अह भंते ! ताल तमाल तक्कलि तेतलि सालि सरला सारगल्लाणं जाव केतिय कदलि कंदलि चम्मरुक्ख गुदंरुक्ख हिंगुरुक्ख लवंगरुक्ख नूयफल खज्जूरि नालिएरीणं, एएसिणं जे जीवा मूलत्ताए वक्क मंति, तेणं भंते ! जीवा कओहिंतो उववज्जंति, एवं एत्थवि मूलादीया दस उसगा कायव्वा जब साली णवरं इमं णाणत्तं मूले कंदे खंधे तयाए सालेय एएस पंचसु शतक में जैसे वनस्पति का अधिकार कहा वैसे ही बाबीसवे शतक में भी शतक में ६० उद्देशे व ६ वर्ग कहे हैं। जिन के नाम. १ ताल आदि वृक्षों का २ एक वाले वृक्षों का बहुत गुठली के फलवाले वृक्षों का ४ बेंगने जैसे गुच्छक वृक्षों का ५ कोरंट वृक्षों का और तुम्बी जैसे वल्ली वृक्षों का. एक २ वर्ग में दश २ उद्दशे कहे हैं ६० उद्दशे होते हैं. राजगृह नगर के गुणशील उद्यान में श्री श्रमण भगवंत महावीर स्वामी को वंदना नमस्कारकर श्री गौतमस्वामी पूछने लगे कि अहो भगवन् ! ताल, तमाल तक्कली, तेतली, साली, सरल, सर गल यावत् केतकी, कदली, कंदली, चर्मवृक्ष, गुंदवृक्ष, हिंगवृक्ष, लवंगवृक्ष, पुगफल, खजूर नालियेर इन जो जीवों मूलपने उत्पन्न हुये होत्रे वे जीवों कहां से उत्पन्न होवे ? अहो गौतम ! जैसे इक्कीसवे शतक
कहते हैं. १ इस गुठली के फलनव मालती जैसे यों सत्र मीलकर
43+ वावसिवा शतक का पहिला उद्देशा 48
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