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णीलगाय लोहियएय हालिइएय सुकिल्लएय ५, सिय कालगाव गीलएष, लोहिय. एय हालिइएय सुकिल्लएय ६, एवं एए छ भंगा भाणियन्वा, एवमेते सन्वेवि एकग दुयगतियगचउगसंजोग पंचग संजोगेस एवं छासीयं भंगसयं भवंति ॥ गंधा जहा पंचपएसियस्स ॥ रसा जहा एयस्स चेव वण्णा ॥ फासा जहा चउप्पएसियस्स ॥ ६ ॥ सत्त परसिरणं भंते ! खंधे कइबण्णे ? जहा पंचपएसिए जाव सिय चउप्फासे पण्णत्ते जइ एगवण्णे-एवं एगवण्णदुवण्ण तिवण्णा जहा. छप्पएसियरस,
जइ चउवण्णे-सिय कालएय गीलएय लोहियएय हालिदएय १, सिय काल एय भावार्थकहना. यों एक संयोगी द्विसंयोगी ४० तीन मयोगी ८० चार सयोगी ५५ और पांच संोगी।
सब १८६ मांगे जानना. गंध के छ पांच प्रदेशिक जैसे कहना, रस के १.८६ वर्ण जैसे कहना और स्पर्श के १६ भांगे चार प्रदेशी जैसे कहन'. यों वर्ण के १८६ गंध के ६ रस के १.८६ और स्पर्श के ३६ सब मोलकर ४५४ भागे हुए ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! सात प्रदेशिक स्कंध में कितने वर्ण मंध रस व स्पर्श पाने हैं ? अहो गौतम ! सात प्रदेशिक स्कंध में पांच वर्ण, दो गंध पांच रस व चार स्पर्श वगैरह जैसे पंचा देशिक संजैसे करना. एक पर्ण दो वर्ण और तीन वर्ण का छ मदेशिक स्कंघ जैसे पाच, चालीस
पण्यत्ति ( भगवती ) सूत्र 48g
वासना शतक का पांचवा उद्देशा