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सूत्र
भावार्थ
4: पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 4000+
णिव्वत्तीय ॥ ३॥कइविहाणं भंते! कम्मणिव्वत्ती पण्णत्ते ! गोयमा ! अट्ठविहा कम्मणिव्यत्ती पण्णत्ते तंजहा - णाणावरणिज कम्मणिव्वती जाच अंतराइय कम्मणिव्वत्ती ॥ रइयाणं भंते! इविहा कंम्मणिब्बत्तीप • ? गोयमा ! अट्टविहा कम्मणिव्वती पं० तजहा णाणावरणिज कम्मणिव्वत्ती जात्र अंतराइयंकम्मणिबत्ती ॥ एवं जाव वैमाणि - णं ॥ ४ ॥ कइविहाणं भंते! सरीरणिव्वत्ती पण्णत्ता ? गोयमा ! पंचविहा सरीरणिव्यत्ती प० तंजहा-ओरालियसरीरणिव्वत्ती जाव कम्मगसरीणिव्वत्ती ॥
रइयाणं भंते ! एचंचेव, एवं जाव वेमाणियाणं णवरं णायव्त्र जस्स जइ सरीराणि
} ॥ ३ ॥ अहो भगवन् ! कर्म निर्वृत्ति के कितने भेद कहे हैं ? अहो गौतम ! कर्म निर्वृत्ति के आठ भेद कहे हैं. ज्ञानावरणीय कर्म निर्वृत्तियावत् अंतराय कर्म निर्वृत्ति, अहो भगवन्! नाकाकी कितनी कर्म निर्वृत्ति { कही ? अहो गौतम ! नारकी को आठ कर्म निवृत्ति कही. ज्ञानावरणीय यावत् अंतराय ऐसे ही वैमानिक { पर्यंत जानना ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! शरीर निर्वृत्ति के कितने भेद कहे हैं ? अहो गौतम ! शरीर निर्वृत्ति के पांच भेद कहे हैं. उदारिक शरीर निर्वृत्ति यावत् कार्माण शरीर निर्वृत्ति नारकी को यावत् त्रैमानिक को ऐसे ही कहना. परंतु जिन को जितने शरीर होवे उन को उतनी शरीर
निर्वृत्ति कहना. ॥ ५ ॥ अहो
48 उन्नीसवा शतक का आठवा उद्देशा
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