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________________ 28 २३७३ 'णो उदीरेंति सेतंणो इंदिय जवणिज्जे। सेतं जवाणिजे।।से किंते भंते! अव्वाबाहं ? सोमिला ! जं मे वातिय पितिय संभिय सण्णिवाइय विविहरोगायंका सरीरगया दोसा उवसंता णो उदीरेंति, सेतं अव्वाबाहं ॥ किंते भंते ! फासुयविहारं ? सोमिला ! ज णं आरामेसु उज्जाणेसु देवकुलेसु सभासु इत्थीपसुपंडगवज्जियासु वसहीसु फासुएसणिजं पीढ फलग सेजा संथारगं उवसंपजित्ताणं विहरामि, सेतं फासुयविहारं ॥ ८ ॥ सरिसवा ते भंते ! किं भक्खेया अभक्खेया ? सोमिला ! सरिसवा भक्खेयावि अभक्खेयावि॥ भावार्थ सहित नाश करना. पुनः उदय भाव को प्राप्त न होना वह नोइन्द्रिय यापनीय कहा है. अहो भगवन् अव्यावाध किसे कहते हैं ? अहो सामिल ! वात, पीत, कफ, सन्निपात वगैरह शरीर में विविध रोगों रहे हुवे है उन का उपशांत होना और उदीरणा नहीं होना सो अव्यायाध. अहो भगवन् ! फ्रामुकविहार किसे कहते हैं ? अहो सोमिल ! जो आराम उद्यान देवालय, सभा, पर्वत, वगैरह में स्त्री पशू पंडग रहित वसति में फ्रासुक एषणिक पीठ, वाजोट, पटिया, * शैय्या व संथारा प्राप्त कर के विचरते हैं वह फ्रामुक विहार है. ॥ ८ ॥ अहो भगवन् ! आप के मत 12 में सरिसन भक्ष्य है या अभक्ष्य है ? अहो सोमिल ! हमारे मत में सरिसव भक्ष्य भी है और अभक्ष्य ।। पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) मूत्र 438 maramananmaanmmmmmmmmanamanuman अठारहवा शतक का दसवा उद्देशा 9882
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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