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________________ भावार्थ 488+ पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) सूत्र 4 देव इत्थीओवि ॥ ५ ॥ जावइयाणं भंते ! चरा अंधगवन्हिणो जीवा तावइया परा अंधगवाम्हणो जीवा ? हंता गोयमा ! जावइया चरा अंधगवण्हिणो जीवा तावया परा अर्धगवणो जीवा ॥ सेवं भंते ! भंतेति ॥ अट्ठारसमस्स चउत्थो उद्देसो सम्मत्तो ॥ १८ ॥ ४ ॥ दो भंते! असुरकुमारा एगंसि असुरकुमारावासंसि असुरकुमारदेवत्ताए उवत्रण्णा, तत्थणं एगे असुरकुमारे देवे पासादीए दरसणिज्जे अभिरूत्रे पडिरूत्रे, एगे असुरकुमारे { • 4+ भठारहवा शतक का पांचवा उद्देशा { ज्योतिषी व वैमानिक की स्त्रियों का जानना ॥ ५ ॥ अहो भगवन् ! जितने अल्प आयुष्यवाले 'बादर} अनिकाय के जीवों हैं उतने उत्कृष्ट आयुष्यवाले अधिकायिक क्या जीवों हैं ? हां गौतम ! जितने अल्प आयुष्यवाले अधिकायिक जीवों हैं उतने उत्कृष्ट आयुष्यवाले अग्निकायिक जीवों हैं. x अहो भगवन् आपके वचन सत्य हैं. यह अठारहवा शतक का चौथा उद्देशा संपूर्ण हुवा. ॥ १८ ॥ ४ ॥ ० चतुर्थ उद्देशे के अंत में अभि का कथन किया, आगे देवता का कथन करते हैं. अहो भगवन् ! असुर) x कितनेक अंधगवणो का अर्थ ऐसा करते हैं कि सूक्ष्म नाम कर्म के उदय से सूक्ष्म अग्रि जीवों और कितनेक आचार्य सूक्ष्मजीवों भी अर्थ करते हैं. २३२९
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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