________________
२२८१
एवं जाव अहे सत्तमाए समोहए ईसिप्पभाराए उववाएयत्वो ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ सत्तरसमस्त छट्ठो ॥ ११ ॥ ६ ॥ पुढवी काइ णं भंते ! सोहम्मे पे र मो : : मोहणित्ता जे भविर इमीसे रयणप भाए पुढवीए पुढवी काइयत्ताए उब जि तए सणं भंते ! किं सेसं तं चेव जहा रयणप्पभार पुत्वीकाइओ सव्व कप्पेसु जाब ईसिप्पभाराए ताव उववाइआ एवं सौम्म पुढवी काइओवि सरसु पुढ वासु . उवधाएयव्यो । हा जाब अहे सत्तमाए एवं जहा सोहम्म
49 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी 8
*प्रकाशक राजाबहादुर लाला सुखदवसहाय जी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ
परे उत्पन्न होवे वगैरह जैसे र प्र । बा का वैसे ही या जानना. ऐसे ही ईपत्ताग्भ र पृथ्यी तक उत्पन्न होने का जानना. जैसे रप्रभा की वक्तव्यता कही. चमे ही सातवी तमतम पृथ्वी की वक्तव्यत कहना. अहाँ भगवन् ! आपके वचन सत्य हैं. यह सतहवा शतक का छठा उद्देशा पूर्ण वा ॥१७॥६॥ । गत उद्देशे में पृथ्वी काया का कथन किया. आगे उद्देशे में भी उस का ही कथन करते हैं. अहे। भगवन् ! सौधर्म देवलोक में पृथ्वी काया मरगतिक समुद्धान. करके इस रत्न प्रभा पृथ्वी में पृथ्वी कायापने उत्पन्न होवे वगैरह सब पूर्वोक्त उद्देशे में कहा वैसे ही यहां कहना. जैसे रत्न प्रभा पृथ्वी कायिक सब देवलोक में यावत् ईपत्यागभार पृथ्वी में उत्पन्न होवे वैसा कहा ऐसे ही सातों पृथ्वी में