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________________ सुत्र भावार्थ * पंचमाङ्ग विवाह पण्णत्ति (भगवती) सूत्र उबरिमहेट्ठिला जहां रयणप्पभाए हेट्ठिल्ला. एवं जाव अहे सत्तमाए, एवं सोहम्मस्सविं जात्र अच्चयरस, गेरेज्जगदिमांणाणं एवं चेत्र णवरं उरिम हेट्ठिल्लेमु चरिमंतेसु देसे पंचिंदियात्रि, मझिल्लविरहिओ सेसं तहेब, एवं जहा मेवेजगविमाणा तहा अणुत्तरविमाणावि, ईसिप्पभारावि ६ ॥ परम.णुत्रोग्गलेणं भंते ! लोगस्स पुरच्छि मिल्लाओ चरिमंताओ पच्चच्छिमिल चरिमंतं एग समएणं गच्छइ,, पच्चच्छिमिलाओ चरिमंताओ पुरच्छिमिलं चरितं एगसमएणं गच्छइ, दाहिणिल्लाओ चरिमंताओं उत्त का आवागमन है शेषले ही कहना जैसे रत्नप्रभा के चारों चरिमांत का कहा वैसे ही शर्कर प्रभा को जानन. यो शेष सब नरक का कहना. सौदि बारह देवलो व नववेक का भी वैसे ही कहना रिंतु इतना विशेष कि उपरवीने चरिनांत से पंचेन्द्रिय देवता के मन का अभाव से मध्य) गंगा नहीं पाता है शेष दो मांगे पाते हैं. ए ही अनुत्तर मानव ईषत् ग्भार पृथ्वी तक कहता. || ६ || अहो भगवन् ! परमाणु पुद्दल लोक के पूर्व के चरिमन् से पश्चिम के चरिमांत तक और पश्चिम के चरिमान्त से पूर्व के चरिमान्त में क्या एक समय में जाता है ? अथवा उत्तर के चरिमान्त से दक्षिण के चरिमान्त, दक्षिण के चरिमांत से उत्तर के चरिमति में क्या एक समय में जाता है ? अथवा उपर के 4- सोलहवा शतक का आठवा २२४५
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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