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शब्दार्थ
श्री अमोलक ऋषिजी 4 अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि
दुबारह जो० योजन का अ० अबाधा अं० अंतर प० प्ररूपा ई० ईषत्माग् शार पु० पृथ्वी का अ... अलोक का के० कितना अ० अबाधा अं० अंतर पु० पृच्छा गो० गौतम दे० देसऊणा जो० योजन का अ० अबाधा अंतर ॥ ॥ ए. यह भ० भगवन् मा. शालवृक्ष उ० ऊष्ण से भेदाया-ततृषा से भेदाया: द० दवाग्नि ज्वाला से भेदाया का काल के अवसर में का० काल कर के क. कहां ग. जावेगा क० कहां उ० उत्पन्न होगा गो० गौतम इ. यह रा० राजगृह. न. नगर में सा० शालवृक्ष पने ५० उत्पन्न है अबाहाए अंतरे पण्णत्ते ॥ ईसिप्पन्भाराएणं भंते ! पुढवीए अलोगस्सय केवइए
अबाहाए पुच्छा ? गोयमा ! देसणं जोअणए अबाहाए अंतरे पण्णत्ते ॥ २ ॥ एसणं भंते ! सालरुक्खए उण्हाभिहते, तण्हाभिहते, दवग्गिजालाभिहते, कालमासे
कालं किच्चा कहिं गच्छिाहइ कहिं उववजिहिइ ? गोयमा ! इहेव रायगिहे णयरे जानना. अनुत्तर विमान व ईपत्याग भार पृथ्वी में कितना अंतर रहा हुवा है ? अहो गौतम अवाधा से बारह योजन का अंतरा कहा है. ईपत्याग भार पृथ्वी व अलोक में कितना अंतर रहा हुवा है! अहो गौतम ! एक योजन में कुच्छ कम का अंतर कहा है ॥२॥ सूर्य के ताप से हणाया हुवा, तृषा से हणाया हुवा, दवामि से हणाया हुवा, शाल वृक्ष काल के असर में काल करके कहां जावेगा कहां उत्पन्न होगा ? अहो गौतम ! इस राजगृह नगर में शालवृक्षपवे उत्पन्न होगा. वहां पर उस की अर्चा,, बंदना, पूजा, सत्कार क सन्मान
• प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ