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________________ शब्दार्थ आंख को उ० खुलीकरे भ० होवे ए. इस रूप णो नहीं इ० यह अर्थ स० समर्थ णे० नारकी ए० एक । + समय में दु० दो समय में ति तीन समय में वि०विग्रह से उ० उत्पन्न होते हैं णे०नारकी को त० तैसे सी० : शीघ्र गति त० तैसे सी० शीघ्र गति वि. विषय १० प्ररूपा ए. ऐसे जा. यावत् वे वैमानीक १०% विशेष ए० एकेन्द्रिय को च० चार समय की बे० विग्रह भा० कहना से शेष तं तैसे॥३॥ सरल शब्दार्थ है. साहरियंवा मुदि विक्खिरेजा, उम्मिसियंवा अच्छि णिन्मिसेज्जा, णिम्मिसियंवा अच्छि र उम्मिसेज्जा, भवे एयारुवे ? णो इणट्टे सम? ॥ जेरइयाणं एगसमएणंवा दुसमएणवा, E - तिसमएणवा, विग्गहेणं उबवजंति णेरइयाणं तहा सीहा गई, तहा सीहागइरिसए पण्णत्ते ; एवं जाव वेमाणियाणं णवरं एगिदियाणं चउसमइए विग्गहे भाणियब्वे शीघ्रगति व शीघ्रगतिका विषय कहा ऐसे ही एकेन्द्रिय छोडकर वैमानिक पर्यंत का जानना एकेन्द्रिय को एकेन्द्रिय की वक्रगति होती है तब प्रथम समय में त्रस नांडी के बाहिर विदिशा में जाता है, दूसरे समय में , अनुश्रेणी गमन से लोक में प्रवेश करे, तीसरे समय में ऊर्च गमन करे और चौथे समय में त्रस नाडी से बाहिर नीकलकर दिशा में व्यवस्थित उपपात स्थान में जावे. ग्रंथकार पांच समय भी कहते हैं. प्रथम समय में बस नाडी से बाहिर अधोलोक में जावे, दूसरे समय में लोक में प्रदेश करे, तीसरे समय में ऊर्च गमन करे, चौथे समय में दिशा में जावे और पांचवे समय में उत्पत्ति स्थान में जावे.. 48 पंचमांग विवाहपण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र 88+ 488चउदावा शतक का पहिला उद्देशा- 44 भावार्थ
SR No.600259
Book TitleAgam 05 Ang 05 Bhagvati Vyakhya Prajnapti Sutra Sthanakvasi
Original Sutra AuthorN/A
AuthorAmolakrushi Maharaj
PublisherRaja Bahaddurlal Sukhdevsahayji Jwalaprasadji Johari
Publication Year
Total Pages3132
LanguageSanskrit
ClassificationManuscript & agam_bhagwati
File Size50 MB
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