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१ अनुवादक-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी +
वित्थडाअसंखेज वित्थडा? गोयमा! संखेज वित्थडा णो अखंज वित्थडा ॥ संखेजेपुणे भंते ! वाणमंतरा वास सयसहस्ससु एग समएणं केवइया वाणमंतरा उववजंति ? एवं जहा असरकमाराणं संखेजवित्थडेस तिाण गमगा तहेत्र भाणियचा. वाणमंतरा. णवि तिष्णि गमगा ॥ ६ ॥ केवइयाणं भंते ! जोइसिय विमाणावास सयसहस्सा पण्णत्ता ? गोयमा ! असखजा विमाणा वास सय सहस्सा पण्णत्ता ॥ तेणं भंत! किं संखजवित्थडा एवं जहा वाणमंतराणं तहा जोइलियाणवि तिणि गमगा माणियव्वा, णवरं एगा तेउलेस्सा उववज्जतेसु पण्णत्तसुय असण्णी णास्थ सेसं तंचेव । हैं या असंख्यात योजन के विस्तारवाले हैं ? अहो गौतम ! संख्यात योजन के विस्तारवाले हैं परंतु असं ख्यात योजन के विस्तारवाले नहीं हैं. अहो भगवन् ! संख्यात योजन के असंख्यात लाख आवास में एक समय में कितने वाणव्यंतर उत्पन्न होते हैं ? अहो गौतम ! जैसे असुर कुमार के संख्यात योजन के विस्तारवाले आवास के तीन गमा को वैसे ही वाणव्यंदर का जानना ॥ ६ ॥ अहो भगवन् ! ज्योतिषीके कितने लाख विमान कहें? अहो गौतम ! ज्योतिषी के असंख्यात लास विमान करे. उन का सघ वर्णन पाणव्यंतरजेले कहना. इसमें मात्र एक तेजोलेश्या कहना. और असंज्ञी नहीं कहना ॥ ७॥ अहो
प्रकाशक राजावहादुर लाला सुखदेवसहायनी ज्वालाप्रसादजी *
भावार्थ