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42 अंनुवादक बालब्रह्मवारी मुनि श्री अमोलक ऋोनी+
माई ॥ ४ ॥ भविय दव्वदेवाणं भंते ! किं एगत्तं पभू विउव्वित्तए पहुत्तपि पभू विउवित्तए ? गोयमा ! एगत्तंपि पभू विउवित्तए पुहुत्तंपि पभू विउवित्तए ॥ एगत्तं विउव्वमाणे एगिदियरूवं जाव पंचिंदिय रूवंबा, पुहत्तं विउव्वमाणे एगिदिय रूवाणिवा जाव पंचिंदिय रूवाणिवा, ताई संखेजाणिवा असंखेजाणिवा, संबद्धाणिवा असंबद्धाणिवा, सरिसाणिवा असरिसाणिवा, विउन्वित्तए विउव्वित्ता .तओ पच्छा अप्पणो जहत्थियाइं कज्जा करेंति एवं णरदेवावि एवं धम्मदेवावि ॥ देवाहिदेवाणं पुच्छा ?
गोयमा ! एगत्तंपि पभू विउव्वित्तए पुहत्तंपि पभू विउवित्तए, णो चेवणं संपत्तीए, र स्थिति जघन्य दश हजार वर्ष उत्कृष्ट तेत्तीस सागरोपम ॥ ४ ॥ अहो भगवन् ! भविक
द्रव्य देव एक अथवा अनेक रूप वैक्रय करने को क्या समर्थ है ? अहो गोलम ! एक अथवा अनेक रूप वैक्रेय करने को भविक द्रव्य देव समर्थ है ? एक रूप वैक्रय करते एकेन्द्रिय यावत् पंचन्द्रिय के रूप का वैक्रेय करे और अनेक रूप वैक्रेय करत एकेन्द्रिय के रूपों यावत् पंचेन्द्रिय के रूपों . संख्यात व असंख्यात संबद्ध या असंबद्ध, सदृश या असदृश ऐसे वैक्रय करने को समर्थ है. फीर अपना इच्छित कार्य करते हैं, ऐसे ही नरदेव व धर्मदेव का जानना. देवाधिदेव एक अथवा अनेक वैक्रय करने में समर्थ हैं
* प्रकाशक-राजाबहादुर लाला मुखदवसहायजी ज्वालाप्रसादजी*.
भावार्थ
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