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शब्दार्थ
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40, अनुवादक बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषीजी
ऋद्धिवंत जा. यावत् अ० अपरिभूत अ० जाने जुबे जी० जीवाजीव जा. यावत् वि. रहते थे ॥२॥ २० उस सं० शंख स० श्रमणोपासक को उ. उत्पला ना० नामकी भा० भार्या हो॰थी मु० सुकुमार जा. यावत् सु० सुरुपा स० श्रमणोपसिका अ. जाने हुवे जी० जीवा जीव जा० यावत् वि० रहती थी ॥३॥ त० उस सा० श्रावस्ती न० नगरी में पो० पुष्कली स. श्रमणोपासक प० रहता था अ० ऋद्धिवंत ॥४॥ ते उस का• काल ते० उस स० समय में सा० स्वामी स० पधारे जा० यावत् प० परिषदा प० पर्युपा है
परिवसंति, अढा जाव अपरिभूया अभिगय जीवाजीवा जाव विहरंति ॥२॥ तस्सणं संखस्स समणोवासगस्स उप्पलाणामं भारिया होत्था, सुकुमाल जाव सुरूवा समणोवासिया अभिगयजीवाजीवा जाव विहरइ ॥ ३ ॥ तत्थणं सावत्थीए णयरीए पोक्खलीणामं समणोवासए परिवसइ, अद्वे अभिगय जाब विहरइ ॥ ॥ तेणं
कालेणं तेणं समएणं सामी समोसढे जाव परिसा पज्जुवासइ ॥ ५ ॥ तएणं ते समस्वरूप जाननेवाले थे ॥ २॥ उस शंख श्रमणोपासक को उत्पला नामक भार्या थी. वह सुकुमार यावत् सुरूपा व जीवाजीव का स्वरूप जानती हुई विचरती थी ॥ ३ ॥ उस श्रावस्ती नगरी में ऋद्धिवंत यावत् जीवाजीव का स्वरूप जाननेवाला पुष्कली नामक श्रावक रहता था ॥ ४ ॥ उस काल उस समय में स्वामी पधारे, परिषदा वंदने को आई यावत् पर्युपासना करने लगी ॥ ५॥ उस समय में उस श्रमणोपासकने
प्रकाशक-राजाबहादुर लाला सुखदेव सहायजी ज्वालाप्रसादजी
भावार्थ