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शब्दार्थ
-बालब्रह्मचारी मुनि श्री अमोलक ऋषिजी *
ते० उम काल तं. उस समय में वा. वाणिज्यग्राम न० नगर हो था व० वर्णन युक्त दू० दूति । पलास चे० चैत्य व० वर्णन जा. यावत् पु० पृथ्वी शिलापट्टक त तहां वा० वाणिज्यग्राम न. नगर में
० मुदर्शन से० श्रेष्टी ५० रहता है अ० ऋद्धिवंत जा. यावत् अ० अपरिभूत स० श्रमणोपासक अ०११ जाने जी0 जीव अनीव जा. यावत् वि० विचरता है सा. स्वामी स० पधारे जा. यावत् प० परिषदा
जीवप्पदेसा विसेसाहिया ॥ सेवं भंते भंतेत्ति ॥ एगारस सयरस दसमो उद्देसो. सम्मत्तो ॥ ११ ॥ १०॥ . . * .. . *............* तेणं कालेणं तेणं समएणं वाणियगामे णाम णयरे होत्था; वण्णओ दूइ पलासे चेइए वण्णओ, जाव पुढवी सिलापट्टए तत्थणं वाणियगामे णयरे सुदंसणे णाम सेट्टी
परिवसइ अढे जाव अपरिभए समणोवासए अभिगय जीवाजीवे जाव विहरइ, प्रदेश हैं इस से सब जीव असंख्यातगुने इस से उत्कृष्ट पद से जीव प्रदेश विशेषाधिक है. अहो भगवन् ! .
आप के वचन सत्य है. यह अग्यारवा शतक का दशवा उद्देशा समाप्त हुवा ॥ ११ ॥ १० ॥ जो दशवे उद्दशे में लोक का स्वरूप कहा अब लोक द्रव्य वर्ती काल का स्वरूप कहते हैं. उस काल उम
समय में वाणिज्य नामक नगर बहुत वर्णन योग्य था. उस की ईशान कौन में दूतिपलाश नामक उद्यान या यावर पृथ्वी शिला पट्ट था. उस वाणिज्य नगर में सुदर्शन नाम का श्रेष्टि रहता था. वह ऋद्धिवंत
*काशक-राजाबहादुर लाला मुखदेवसहायजी ज्वालाप्रसादजी
भावार्थ