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शब्दार्थ |
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सत्र
पंचांग विवाह पण्णत्ति ( भगवती ) मूत्र
ह. हरीत ता. उन की अ० आज्ञा दो त्ति ऐसा करके पु० पूर्व दिशा में प० जाकर जा. जो त० तहां, क० कंद जा० यावत् ह० हरित ता० उन को गे ग्रहगकरे कि० कावड में भ० भरकर द० दर्भ कु. कुश म. समिध प० तोडे हवे पत्र गे० ग्रहणकरे जे० जहां स० अपना उ० आश्रम ते. तहां उ० आकर कि० कावड ठ० स्थापन कर वे० वेदिका को व. पूजकर उ० लेपन सं. संमार्जन क० करके द० दर्भ क कलश ह. हस्त में लेकर जे. जहां गं. गंगा म० महानदी ते० तहां उ० आकर मं० गंगा
फलाणिय बीयाणिय हरियाणिय ताणि अणुजाणउ तिकटु, पुरच्छिमं दिसिं पसरइ २ त्ता जाणिय तत्थ कंदाणिय जाब हरियाणिय ताइं गण्हइ किढिणसंकाइयं भरेइ, किढि २ त्ता दन्भेय कुसेय समिहाउय पत्तामोडंच गिण्हेइ, जेणेव सए उडए तेणेव उवागच्छइ २ ता, किढिणसंकाइयं ठवेइ, किढि २ ता, वेदि वढेइ २ ता, उवले.
वणसंमजणं करेइ २ त्ता, दब्भकलसहत्थगए जेणेब गंगा महाणदी तेणेव उवाछाल, पत्र, फूल, फल, बीज व हरित वगैरह वस्तु ग्रहण करने की आज्ञा दो. ऐमा कहकर पूर्व दिशा कीom तरफ चले और कंद मूल आदि ग्रहण करके कावड में डाले. फीर दर्भ कुश, समिध व तरुण शाखा के पत्र ग्रहण किये पीछे अपनी पर्णकटि में आये. वहां कावड नीचे रखी और रेती की बनायी हड वेदिका को साफ की गोबरादि से उस में विलेपन किया. फीर वहां से दर्भ व कलश हस्त में रखकर
अग्यारवा शतकका नववा उद्देशा
भावार्थ
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