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उक्कोसेणं अणंतकालं वणस्सइकालो । एवं देसबंधंतरंपि ॥ २३ ॥ जीवस्सणं भंते! रयणप्पभा पुढवि नेरइयत्ते नो रयणप्पभा पुढवि पुच्छा ? गोयमा ! सव्वबंधतरं जहण्णेणं दस वाससहस्साइं अंतोमुहुत्तमब्भहियाई उक्कोसेणं वणस्सइकालो, देसबं- ११९१ धंतरं जहण्णेणं अंतोमुहत्तं, उक्कोसेणं अणंतकालं, वणस्सइकालो, एवं जाव अहे
सत्तमाए;णवरं जा जस्स ठिई जहणिया सासवबंधंतरं जहण्णेणं अंतोमुहुत्तंमब्भहिया रहकर फीर वायुकाय में उत्पन्न हुवा वहां भी क्षुल्लक भव रहकर वैक्रेयपने को प्राप्त हुवा इस से जघन्य अंतर्मुहूर्त उत्कृष्ट वायुकाय वनस्पतिकायादि में उत्पन्न होने से अनंत कालतक वहां रहे और पीछे वायु-१ काया में उत्पन्न होवे वहां वैक्रेय शरीर प्राप्त करते प्रथम समय में सर्व बंध होवे वैसे ही देश बंधका अंतर जानना ॥ २३ ॥ अहो भगवन् ! रत्नप्रभा पृथ्वी को प्राप्त होकर कोई जीव रत्नप्रभा सिवाय अन्य स्थान उत्पन्न हुवा और वहां से पीछा रत्नप्रभा में आया तो वहां का वैक्रेय शरीर प्रयोग बंध का कितना अंतर कहा ? अहो गौतम ! जघन्य अंतर्मुहूर्त अधिक दश हजार वर्ष, उत्कृष्ट वनस्पति काल सो अनंत काल.00 रत्नप्रभा में उत्पन्न होते प्रथम समय में सर्व बंधक होकर दश हजार वर्ष की स्थिति होने से फीर देश
बंधक होवे और दश हजार वर्ष पीछे काल कर वहां से गर्भज तिर्यंच पंचेन्द्रिय में उत्पन्न होवे. वहां अंत1+ मुहूर्त रहकर फीर रत्नप्रभा पृथ्वी में सर्व बंधक होवे. इस में तीन - समय की विग्रह गति से नारकी में है।
भावाथ
24.28.2 आठवां शतकका नववा उद्देशा
पंचमांग विवाह पण्णत्ति ( भवगती ) सूत्र